Tuesday, 19 February 2019

बीमारियों के प्रकोप से बचने के लिए अपनाना होगा आपको ये तरीका

आज का दौर बीमारियों का दौर है। हम रोजाना नई बीमारियों सामना कर रहे हैं। आज कोई ही ऐसा व्यक्ति होगा जो बीमार न होता हो, जो अपने स्वास्थ्य से परेशान न हो। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि नई पीढ़ी बीमारी में ही पलती है और बीमारी में ही इस दुनिया को देखती है। सवाल यही है कि हमारी इस दुर्दशा का कारण क्या है?  हमारा खानपान या हमारी जीवनशैली।
हम जो सब्जियां खाते है, वो गंदगी में उगाई जाती हैं। उनमें कैमिकल इतना होता है कि जो हमें नुकसान पहुंचाती हैं। अन्न रासायनिक उवर्रकों के प्रयोग से पककर हम तक आता है, गुड़, शक्कर, दूध सहित रसोई में आने वाली हर वस्तु रसायनों, कीटनाशकों से पोषण पाकर हम तक पहुँचती है। इस जहर को हम खाते है , नतीजन हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और बीमारियों का कहर हम पर टूट पड़ता है। ऐसे में जरूरत है पूरी तरह जैविक उत्पादों की व प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली की। ऐसा ही एक प्रयोग उत्तरप्रदेश के बिजनौर जिले में मनोज वर्मा जी कर रहे है।

 बिजनौर  जिले के अफजलगढ़ गांव के वासी मनोज वर्मा वैसे तो व्यापार आभूषणों का करते है, पर जैविक उत्पादों पर वैज्ञानिक की तरह काम करते है। यही वजह है उनका यह कार्य आसपास के ग्रामीणों के लिए एक आदर्श बन चूका है। मनोज जी के घर में प्रवेश करने पर सबसे पहले आपकों दर्शन होंगे गाय के। इनका कहना है कि उनके पूरे ऑर्गेनिक फर्म का आधार ये गाये है। भारतीय नस्ल की इन गायों का जिक्र करते कहते है, भारतीय संस्कृति में गाय को गौमाता कहने के पीछे वैज्ञानिक कारण है, यदि ये गाये रसायनों के प्रयोग से पका चारा खाती है तो दूध में उसका असर नहीं होता है।  बल्कि विदेशी नस्ल के साथ ठीक इसके उलट होता है। देशी गाय के गोमूत्र का प्रयोग कीटनाशक की जगह पर हम करते है। 

मनोज जी के घर के साथ सूर्य की रश्मियों के आकार का एक बेहद आकर्षक उपवन बना है, जहाँ विभिन्न मौसमी सब्जियां, फलों व फूलों की क्यारियां सजी है। गाजर, मूली, धनियां, पालक, गोबी, सेम, टमाटर, आलू, शकरकंद व मटर सहित वे सारी सब्जियां जिनकी पैदावार सर्दियों के मौसम में होती है। चीकू, नारंगी, केला, नींबू आदि के पौधे फलों से लदे हुए है। आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों में तुलसी, एलोवेरा इत्यादि लगी हुई है। सेंगुड़ा जिसकी पैदावार बाहर की दुनिया में समान्यतः गंदे पानी में की जाती है, वो एकदम साफ पानी में लहलहा रहा है। व्यस्थित तरीके से लगे इस उपवन की सबसे खास बात है, यहाँ उपलब्ध सारे फल, फूल व सब्जियां ऑर्गेनिक है। किसी भी तरह के रसायन का प्रयोग नहीं करते है। केवल गोबर व गौमूत्र की सहायता से बेहतरीन पैदावार ले रहे है।

मनोज जी बताते है कि उनका एक नया प्रयोग लकड़ी के बुरादे व जैविक खाद को गमले में डालकर सब्जियाँ उगाने का है जो बिना मिट्टी के सब्जी प्राप्त करने की अनोखी विधि है इसीलिए गमलों में लगे सब्जी के ये पौधे शहरी लोगों के लिए वरदान की भांति है क्योंकि शहरों में जमीन की कमी होती है तो लोग गमलों में अपने परिवार के  लिए पर्याप्त सब्जी का उत्पादन कर सकते है।
गाय के लिए जैविक चारे की व्यवस्था है, ताकि दूध, गोमूत्र, गोबर जैविक रूप में प्राप्त हो सके। रसोई भी पूरी तरह से भारतीयता के रंग में रंगी हुई है, अनाज पीसने हेतु पारम्परिक चक्की, खाना पकाने के लिए गोबर के कंडे, मिट्टी  के बर्तन व चूल्हा उपलब्ध है |


ये प्राणायाम व ध्यान करने के लिए उपवन के बीच बने आसन। यहां बैठकर  प्रणायाम करने से औषधियों की सुंगध शरीर में जाकर स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है।


आपने शास्त्रों में सुना होगा कि धरती से ऊपर पेड़ पर बैठकर साधना करने से अधिक लाभ मिलता है, तो इसका प्रयोगिक रूप इस उद्यान में नीम के वृक्ष पर बनी इस कुटिया से देखा व अनुभव किया जा सकता है।
उपवन में लगे पौधों तक पानी के वितरण की व्यवस्था भी अच्छे से कर रखी है।
इसके साथ ही यहां वातावरण के शोधन के लिए नित्य यज्ञ होता है, जिसमें परिवार के सदस्य वैदिक मंत्रों के माध्यम सबके कल्याण की कामना करते है।

मनोज जी का कहना है कि इस जमीन को ऑर्गेनिक बनाने के लिए उन्होंने तकरीबन 1 साल मेहनत की। इस दौरान सफेद चुना, गोबर व गौमूत्र का इस्तेमाल कर जमीन को जैविक बनाया। जिसके कारण अब क्वालिटी के साथ अच्छी क्वांटिटी में जैविक उत्पाद प्राप्त कर रहे है।

मनोज जी बताते है कि मेरा पूरा परिवार इन ऑर्गेनिक उत्पादों का प्रयोग करता है, इसलिए सभी निरोगी है। मैंनें जो यह ऑर्गेनिक उपवन से लेकर खाने का मॉडल  बनाया यह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे इसलिए व्यापक स्तर पर उत्पादन की दिशा में कार्य कर रहा हूँ।

यदि आप विस्तार से उपर्युक्त तथ्यों को जानकर इस पर कार्य करने की इच्छा रखते है तो मनोज वर्मा जी से नीचे दिए गए नंबर पर संपर्क कर सकते है-
 9412567916 





Wednesday, 14 November 2018

डॉ चिन्मय पंड्या का जीवन परिचय


डॉ चिन्मय पंड्या नाम सुनते ही मन में एक आदर्श युवा की छवि उभरती है, एक ऐसा युवा जो ब्रिटेन जैसे शाही देश में  डॉक्टर की सर्विस त्यागकर अपनी मातृभूमि की सेवा के भाव से पुनः देश लौटे। 2010 से लगातार देव संस्कृति विश्वविद्यालय में प्रतिकुलपति के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे है, साथ-साथ राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर की कई नामी सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे है।

वर्त्तमान में डॉ पंड्या अध्यात्म के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर नोबेल पुरस्कार के समकक्ष टेम्पल्टन पुरस्कार की ज्यूरी के मेंबर भी है, जो कि समूचे भारतवर्ष के लिए गर्व और गौरव की बात है क्योंकि पहले भारतीय है जो इस पुरस्कार की चयन समिति के सदस्य है। अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ प्रणव पंड्या जी इनके पिता हैं। करोड़ों गायत्री परिजनों के आस्था के केंद्र युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ  पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य जी व माता भगवती देवी शर्मा की गोदी में खेलने का सौभाग्य बचपन में इन्हें प्राप्त हुआ।

 करिश्माई व्यक्तित्व के धनी डॉ पंड्या भारतीय संस्कृति को वर्तमान की तमाम समस्याओं के समाधान के रूप में देखते है। इनके ओजस्वी भाषण सुनने को हर कोई लालायित रहता है। यह अपने धाराप्रवाह उद्बोधन से श्रोताओं को भीतर से झकझोरकर सकारात्मक दिशा में सोचने को मजबूर कर देते है। भारतीय वेशभूषा धोती-कुर्ते  व खड़ाऊ धारण किये डॉ पंड्या बेहद विनम्र स्वभाव के धनी है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय को परिवार की भांति संचालित करके डॉ पंड्या प्रतिकुलपति  के साथ अभिभावक की भूमिका का निर्वहन कर रहे है। इसी का नतीज़ा है कि विद्यार्थी प्यार से इन्हें भैया भी कहते है। यहाँ अध्ययनरत हो या पुराना कोई भी विद्यार्थी सहजतापूर्वक इनसे मिल सकता है। नित्य नये प्रयोग करने का स्वभाव  इनके व्यक्तित्व में चार चांद लगाता है।

बेहद कम समय में डॉ पंड्या ने काफी ऊँचे मुकाम हासिल किये है।
संयुक्त राष्ट्र संगठन यूएनओ द्वारा विश्व शांति के लिए गठित अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक आध्यात्मिक मंच के निदेशक के साथ ही इंडियन काउंसिल ऑफ कल्चरल रिलेशन के परिषद् सदस्य जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं।

बीते साल ब्रिटेन रॉयल मेथोडिस्ट हॉल में फेथ इन लीडरशिप संस्थान द्वारा विभिन्न धर्मों के आपसी सद्भाव विषय पर डॉ पंड्या ने अपने विचार रखे, जिसमें प्रिंस चार्ल्स, कैंटरबरी के आर्कबिशप, यहूदियों के मुख्य आचार्य, ब्रिटेन के गृहमंत्री एवं प्रधानमंत्री कार्यालय के समस्त पदाधिकारी उपस्थित थे। डॉ पंड्या के विचार से प्रभावित होकर उन्हें दूसरे दिन हाउस ऑफ लॉर्डस में अपने विचार व्यक्त करने को आमंत्रित किया गया।

डॉ पंड्या ने दो साल पूर्व इथोपिया में आयोजित यूनेस्को के सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। नतीज़न योग को वैश्विक धरोहर का दर्जा मिला। इसी साल वियना में हुए संयुक्त राष्ट्र धर्म सम्मेलन में डॉ पंड्या ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनके वक्तव्य से प्रभावित होकर पाकिस्तानी धर्म गुरुओं ने उन्हें पाकिस्तान आने का न्यौता दिया।
ऐसी उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, जो उनके प्रखर व्यक्तित्व की वैश्विक छाप को दर्शाती है। इनकी अब तक की जीवन यात्रा को देखकर लगता है आने वाले दिनों में ये कामयाबी कई बड़े कीर्तिमान स्थापित करने वाले है।

Monday, 5 November 2018

दीवाली की धूम के बीच हवा व पटाखे के बीच एक रोचक चर्चा

डिसक्लेमर : यह रोचक वार्तालाप हवा और पटाखे के बीच का है। जिसे पढ़ने पर आपको पता चलेगा कि यदि ये दोनों सजीव होते तो बढ़ते वायु प्रदूषण पर आपस में क्या वर्तालाप करते ?



वार्तालाप
हवा : पटाखे! दीवाली आते ही तुम फटना शरू हो जाते हो। चारों तरफ तुम्हारी ही आवाज सुनने को मिलती है।
पटाखा : ये ही तो अपना रुतबा है, गली-मोहल्ले, गाँव-शहर हर जगह मैं अपनी धूम मचाता हूँ।
हवा : एक बात बताओं कि तुम धुंए का इतना धंधुकार क्यों करते हो?
पटाखा : सुन, मेरे धमाके का उत्पाद धुंआ है इस पर तुम अँगुली नहीं उठा सकती हो।
हवा : तुम्हारे इस उत्पाद का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता है, प्रदूषण की बदनामी मेरे नाम के आगे लगती है।
पटाखा : इसमें मेरा क्या दोष है ? मैं खुद से थोड़ा ही फटता हूँ, पैसे देकर लोग मेरी खरीदारी करते है, फिर मुझे फोड़कर दीवाली मनाते है।
हवा : तुम जिस दीवाली की बात कर रहे हो उसमें मेरे पुत्र का बहुत बड़ा योगदान है।
पटाखा : क्या योगदान है ?
हवा : मेरा पुत्र हनुमान ही था, जिसने सीता जी को रावण के चंगुल से  मुक्त कराने में राम के सहयोगी की प्रमुख भूमिका निभाई थी।
पटाखा : इसका दीवाली से क्या मतलब ?
हवा : तुम केवल धमाका ही करते हो, कुछ पता तो  है नहीं तुम्हें।
राम ने सीता जी को रावण से मुक्त कराने तक वापस घर नहीं लौटने की शपथ ली थी। मेरे बेटे हनुमान ने राम जी की इस शपथ को पूरा करवाया।
पटाखा : फिर ?
हवा : इसके बाद रामजी जी जब वापस अयोध्या अपने घर लौटे तो अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर उनका स्वागत किया।
तब से उस दिन पर दीपावली मनाने का सिलसिला शरू हुआ जो आज भी जारी है।
पटाखा : यानि मैं उस दौर में नहीं था।
हवा : बिल्कुल नहीं थे।
मॉर्डन लोगों ने मेरे बेटे का एहसान भुलाकर तुम्हारे माध्यम से मुझे ही प्रदूषित करना शुरू कर दिया। पर इसका दुष्परिणाम , खुद उन्हें ही झेलना होगा।
बेचारा सुप्रीम कोर्ट है जो मेरी शुद्धि के लिए प्रयास करता है।
पटाखा : देखो मैं तुम्हारा  दुःख समझ सकता हूँ पर मेरे वश में कुछ नहीं है।
मेरा एक नया वर्जन है, इकोफ्रेंडली वाला। अगर लोग चाहे तो उसका उपयोग कर सकते है, जिससे धमाका तो होगा पर प्रदूषण नहीं।
हवा : धन्यवाद पटाखा। तूने तो मेरी बात समझ ली पर ये लोग कब समझेंगे जो मुझे प्रदूषित कर अपने ही पाँवो पर कुल्हाड़ी मारते जा रहे है। कभी तुम्हारे माध्यम से तो कभी गाड़ियों के माध्यम से।
पटाखा : ये तो समझदारों की नासमझी है कभी तो इन्हें अकल जरूर आएगी।
हवा : मुझे भी यही आशा है। ठीक है पटाखे अब मैं चलती हूँ वरना लोगों का श्वास लेना मुश्किल हो जाएगा।




Tuesday, 2 October 2018

देव संस्कृति विश्वविद्यालय एक अनूठा प्रयोग, विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में सहायक

देव संस्कृति विश्वविद्यालय की हर गतिविधि अपने आप में खास होती है क्योंकि उसके केंद्र में विद्यार्थियों का व्यक्तित्व विकास होता है। ऐसी ही एक गतिविधि प्रज्ञा रेडियों के रूप में बालक छात्रावास में बीते दो सालों से निरंतर चली आ रही है। 
शाम को प्रार्थना के बाद छात्रों द्वारा नियमित रिकॉर्डेड रेडियों कार्यक्रम चलाया जाता है। जिसमें जीवन प्रबंधन से जुड़े विषय, जन्म दिन विशेष, त्यौहार-पर्व सन्देश के साथ हमेशा "कौन बनेगा प्रज्ञा पुत्र" के तहत एक सवाल होता है। सही जवाब देने वाले प्रतिभागीयों में से एक छात्र को लक्की ड्रॉ के जरिये चुना जाता है प्रज्ञा पुत्र। जिसको प्रज्ञा उपहार के रूप में युग साहित्य दिया जाता है ।


छात्रावास अधीक्षक डॉ.  शिवनारायण प्रसाद जी प्रज्ञा पुत्र विजेताओं को युग साहित्य भेंट करते हुए।

इसके अलावा इस रेडियों कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न समाचारों का साप्ताहिक प्रज्ञा बुलेटिन के जरिये प्रसारण होता है। साथ ही छात्रावास में  संचालित विभिन्न सकारात्मक कार्यक्रमों को प्रज्ञा रेडियों में विशेष अंदाज़ में प्रस्तुत किया जाता है। शनिवार शाम को उन विद्यार्थियों के साक्षात्कार का प्रसारण किया जाता है जो कुछ नया प्रेरणादायी कार्य करते है ताकि बाकि छात्र प्रेरणा ले सके।

छात्रावास अधीक्षक डॉ.  शिवनारायण प्रसाद जी के मुताबिक प्रज्ञा रेडियों का यह कार्यक्रम विद्यार्थियों द्वारा प्रो. डॉ गोपालकृष्ण शर्मा जी के मार्गदर्शन में सम्पन्न होता है। इस कार्यक्रम की सबसे खास बात यह है कि इसमें सभी कॉर्सेज के छात्रों की भागीदारी  रहती है। चाहे यह भागीदारी आर.जे. के रूप में हो या "कौन बनेगा प्रज्ञा पुत्र" में प्रतिभागी के रूप में हो।
ऐसे रचनात्मक कार्यों से विद्यार्थियों का प्रोफेसनली डवलपमेन्ट होने के साथ साथ व्यक्तित्व के अन्य आयामों का विकास होता है। 




Sunday, 23 September 2018

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में चला स्वच्छता महाअभियान


देव संस्कृति विश्वविद्यालय में आज भारत सरकार द्वारा घोषित स्वच्छता पंखवाड़े के तहत महाश्रमदान किया गया।  कुलपति शरद पारदी जी,  प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पंड्या ने  प्रज्ञेश्वर महाकाल परिसर में झाड़ू लगाकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की।  करीब दो घण्टे चले इस अभियान में विद्यार्थियों के साथ स्टाफ के मेम्बर्स ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वोलेंटियर्स ने विश्विद्यालय परिसर में स्थित श्रीराम भवन, चैतन्य भवन, प्रज्ञेश्वर महाकाल, श्रीराम स्मृति उपवन, मृत्युंजय सभागार व आस-पास के क्षेत्र में सफाई की।
महाकाल परिसर में सफाई करते विद्यार्थी।

साथ ही छात्र-छात्राओं ने रंगोली,पोस्टर व कोटेशन के माध्यम से स्वच्छता को लेकर अपने भाव प्रकट किए। 
इस अवसर पर प्रतिकुलपति डॉ पंड्या जी ने कहा कि सफाई स्वभाव का अंग होनी चाहिए। यदि मन स्वच्छ होगा तो उसकी अभिव्यक्ति बाहरी सफाई व सुव्यस्थता में होगी। पंड्या जी ने स्वच्छता को सच्ची सेवा बताते हुए कहा कि यदि हम स्वच्छता की शपथ लेकर उसके लिए जो कार्य करते है वह समाज व राष्ट्र निर्माण में अद्वितीय भूमिका अदा करते हैं।
इस पूरे अभियान की डीडी न्यूज़ द्वारा कवरेज भी की गई। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा गाँधीजी की जयंती के उपलक्ष में स्वच्छता पंखवाड़ा मनाया जा रहा है, जिसमें स्कूलो, कॉलेज, विश्वविद्यालय समेत विभिन्न संस्थाएँ सक्रिय रूप से भागीदारी निभा रही है।

Saturday, 15 September 2018

वर्तमान राष्ट्रीय मुद्दों को जाने नये अंदाज़ में


वाह भारत! तेरा क्या कहना।  रमजान के महीने में मौलवी जी की माइक पर पुकार पूरी हुई थी कुछ दिन बाद गणों के देवता गणपति का पर्व आ गया। तो गली-गली में गण (लोग) डीजे पर झूम रहे है। गणेश जी के बड़े-बडे़ कानों को गीत सुनाने के लिए सामान्य जनों के छोटे कानों की तो ऐसी-तैसी कर रखी है।

 इस शोर शराबे के बीच माल्या ने धमाकेदार एंट्री की और मीडिया को नया मसाला मिल गया। राजनेताओं की तो बल्ले-बल्ले हो गई चुनावी मौसम में चर्चा का केंद्र बिंदू मिल गया। मजेदार बात भी है विपक्ष की आक्रामकता को सत्तापक्ष के एक सांसद ने ही खुराक दे दी। सत्ता पक्ष बचाव की मुद्रा में है पर तीखे तेवरों के साथ। विरोधियों को आईना दिखाने हेतु मंत्रियों की टीम मैदान में है।

पूरी रस्साकसी की जड़ तो चुनाव है। कौन कहता है चुनावों में ताकत नहीं है एक-दूसरे को सीधी नजर से नहीं देखने वाले आज हाथ मिलाने को मजबूर है। किन्तु मामला अब भी मुश्किल है क्योंकि बुआ-बबुआ की जोड़ी बनती देख नेताजी के परिवार में फूट पड़ गई। देखते-देखते नये मोर्चे का गठन हो गया। वह भी उस प्रदेश में जहां से दिल्ली जाने का रास्ता तय होता है। उधर शाह बाबा को भय है  2019  इलेक्शन हाथों से फिसल गया तो 50 सालों तक हंगामा करने के सिवाय कुछ नहीं बचने वाला है। इसलिए तो चुनावी राज्यों में यात्राओं का दौर जोरो पर है।

सपनोंके पीएम ने संसद में बड़े सरदार को गले लगाकर आंख क्या मार दी। जमाना पीछे ही पड़ गया। अब भाषण की कला में भी पारगंत हो गए है। जनेऊ का प्रदर्शन किया, मंदिरों की यात्रा की। ठेठ मानसरोवर तक पहुंच गये। और तो और तो बाज की भांति माल्या के मुददे को भी झपट लिया। अब तो सपना पूरा होगा ही!

रुपया दिनोंदिन गिर रहा है। ससूरे ने गिरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लगता है रुपये ने भांग की गोली ज्यादा ही खा ली है क्योंकि ये गिर के उठ भी नहीं पा रहा है। मंत्री जी के रवैये से तो लगता है, वे भारतीय शास्त्रों में लिखे सूत्र का पालन कर रहे है  "गिरने वाला खुद उठता है"।

Friday, 29 June 2018

राजस्थान में लंबी जद्दोजहद के बाद भाजपा को मिला प्रदेश अध्यक्ष


आखिरकर राजस्थान बीजेपी ने ढाई महीने की लंबी खींचतान के बाद राज्यसभा सदस्य मदनलाल सैनी को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंप दी। भाजपा के इस फैसले से पार्टी में वसुंधरा की साख को और मजबूती मिलेगी। क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त करना चाहता था। लेकिन सीएम वसुंधरा ने जातिगत समीकरणों का हवाला देते हुए शेखावत की नियुक्ति पर सहमति नहीं दी। जिसके चलते पिछले 75 दिनों से प्रदेश बीजेपी के मुखिया का पद खाली पड़ा था। कर्नाटक चुनाव से पहले व बाद कई मीटिंग्स के बाद मदनलाल सैनी को प्रदेश बीजेपी की कमान सौंपी है।

कौन है मदनलाल
वर्तमान में राज्यसभा सांसद मदनलाल झुंझुनू के गुड़ा से विधायक रह चुके है। साथ ही प्रदेश बीजेपी की अनुशासन कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर संगठन में काम किया है।



मदनलाल की  नियक्ति के पीछे की वजह
मदनलाल ओबीसी वर्ग से आते है इसलिए राजस्थान के ओबीसी वोटर्स को साधने के लिए इन्हें अध्यक्ष बनाया है। इसके अलावा प्रदेश में माली वोटर्स भी बड़ी संख्या में है मदनलाल माली जाति से आते है इसलिए अब माली वोटर्स भी इनके साथ खड़ा होकर भाजपा को सपोर्ट कर सकता है। आपको बता दे कि राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के कद्दावर नेता अशोक गहलोत भी माली जाति से आते है, इन्हीं के जवाब में मदनलाल को बड़ा पद देकर भाजपा ने कांग्रेस के परंपरागत वोटों में सेंध लगाने का प्रयास किया है।

Monday, 21 May 2018

सूखे कंठ को मिलता है यहाँ मुफ्त में मीठे पानी का सुकून

आँखों देखा हाल....
रेतीले टीले, कड़ी धूप, बीच से निकलती तपती ट्रेन, जिसमें आप सवार हो, यदि आपको मुफ्त में ठंडा पानी पिला दे तो उस समय वह साक्षात भगवान के समान लगता है।
ऐसा ही अनुभव आपको पश्चिमी राजस्थान की  रेल यात्रा में मिल सकता है। राजस्थान की सीमा शुरू होते ही रेगिस्तानी टीले दिखने  शुरू हो जाते है। इस मौसम यानी गर्मी में लू का भी प्रकोप भी अपनी चर्म सीमा पर रहता है। इसी वजह से  रेल का तापमान भी बढ़ जाता है। कंठ सूख जाता है, ठंडे पानी को जी तरसता है।  इस हालात में रेलवे स्टेशन पर कुछ लोग खासकर माता-बहने मुफ्त में ठंडा पानी पिलाती आसानी से नजर आ सकती है। यात्रियों के लिए वह ठंडा पानी किसी अमृत से कम नहीं होता और पिलाने वाले लोग किसी भगवान से कम नहीं  होते।

उन सेवकों का जीवन सादा होता है, पहनावा स्थानीय राजस्थानी और सुगन्ध भी अपनी संस्कृति की। हाँ, जरूर वे लोग बोतलों में बंद पानी पीने वालो और आधुनिकता के अंधों के लिए अनपढ़ गंवार हो सकते है पर वास्तव में विचारों से महान होते है, जिसकी झलक ऐसे परमार्थ व सेवा कार्यों में दिखती है। वे ही  भारत की सच्ची शान व पहचान है। पर मीडिया के मित्रों के लिए वे कभी हैडलाइन नहीं बनते क्योंकि उनके पास सनसनी नहीं होती है। आप और मेरे जैसे लोगों के लिए वे चर्चा का विषय भी होते है और प्रेरणा का स्रोत भी। कारण जमीनी जुड़ाव हो सकता है या कुछ और भी। जो भी हो ऐसे आँखों देखे नजारों को लिखने हेतु अपनी कलम बैचेन हो जाती है। आराम तभी मिलता है जब आप तक ये सकारात्मक खबरे पहुँच पाती है।

Saturday, 12 May 2018

कर्नाटक में लोकतंत्र का पर्व सफलतापूर्वक संपन्न, 70 प्रतिशत प्रदेशवासियों ने की शिरकत


आज कर्नाटक विधानसभा चुनाव छिटपुट घटनाओं को छोड़कर शान्तिपूर्वक संपन्न हुए। चुनाव आयोग ने बताया शाम छह बजे तक राज्य की 224 में से 222 विधानसभा सीटों पर 70 प्रतिशत वोटिंग हुई। आपको बता दें कि बची दो सीटों में से आरआर नगर सीट पर 10,000 वोटर कार्ड जब्त होने के कारण मतदान की तिथी आगे बढ़ा दी गई। वहीं दुसरी सीट पर भाजपा के प्रत्याशी बीएन विजय कुमार की मौत की वजह से आज वोटिंग नहीं हुई। पिछले चुनाव में मतदान का यह आंकड़ा 71.14 फीसदी था।


2600 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद
आज 2600 से अधिक उम्मीदवारों की किस्मत को प्रदेशवासियों ने ईवीएम में कैद कर दिया। सुबह से ही पोलिंग बूथ  पर मतदाताओं की लंबी कतारें लग गई थी। दिन में तेज धूप के चलते चुनाव आयोग ने शाम को मतदान का समय एक घन्टे बढ़ाकर 6 बजे कर दिया। 

कौन बनेगा कर्नाटक का सीएम फैसला 15 मई को
अब इंतजार है 15 मई का। क्योंकि इस दिन, कौन बनेगा कर्नाटक का मुख्यमंत्री, इस सवाल का सटीक जवाब चुनाव परिणाम ही बताएंगे। हो सकता है कांग्रेस से सिद्धारमैया 25 सालों का इतिहास तोड़कर लगातार दूसरी बार सीएम बने या फिर भाजपा से येदियुरप्पा मुख्यमंत्री की कमान सभांले। एक्जिट पोल की माने तो संभावना त्रिशंकु विधानसभा की भी है।
यदि ऐसा होता है तो भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के चांसेज ज्यादा है क्योंकि पिछले चुनावों में गोवा, मणिपुर व मेघालय में भी वहां की जनता ने किसी को पूर्ण बहुमत नहीं दिया था और कांग्रेस सबसे अधिक सीटे जीतने के बावजूद भी बहुमत से दूर रह गई थी। तीनों राज्यों में नम्बर दो पर रही भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के सहयोग से अपनी सरकार बनाई थी।
एक्जिट पोल यदि सही साबित होते है तो ऐसे हालात कर्नाटक में देखने को मिल सकते है। जद-एस के सहयोग से भाजपा येदियुरप्पा को सीएम बना सकती है। खैर जो भी हो कर्नाटक के लोगों ने अपना निर्णय ईवीएम में बंद कर दिया है, जो भी सीएम बने प्रदेश के लोगों से किए चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़े।


इंतजार चुनाव परिणाम का
चुनाव से पहले सभी दलों ने जमकर एक-दूसरे पर जुबानी वार किए। चाहे भाजपा की तरफ से पीएम मोदी व टीम अमित शाह हो या फिर कांग्रेस की ओर से सीएम सिद्धरमैया व टीम राहुल गांधी सबने एक-दूसरे पर खूब चनावी कीचड़ उछाला पर अब सभी को इंतजार है चुनावी परिणाम का।


चुनाव आयोग एक्शन के मूड में
इस बार चुनाव से पहले कर्नाटक में 171 करोड़ रुपये की नकदी, गहने व मादक पदार्थों की गिरफ्तारी भी चौकान्ने वाली है क्योंकि ये यूपी के बाद दूसरा राज्य है, जहां चुनाव से पूर्व अवैध धन की इतनी बड़ी मात्रा में गिरफ्तारी हुई है। आरआर नगर सीट से 10,000 चुनावी आईडी कार्ड की गिरफ्तारी भी हैरान कर देने वाली है। क्योंकि ऐसे मामले लोगों की लोकतंत्र के प्रति आस्था  डिगाने का काम करते है। इसलिए वहां केवल चुनाव निलबंन करना पर्याप्त नहीं है बल्कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही लोगों के मन में चुनाव के लिए और अधिक आदर व विश्वास बना सकती है।

Saturday, 5 May 2018

नशा है जीवन नर्क बनाने का नुस्खा

उम्र से युवा, समझ पशु जैसी, उद्देश्य एक ही कि किसी तरह नशे का बंदोबस्त हो, अपराधी चलन, बीमारियों का आक्रमण, परिवार परेशान व समाज हैरान कुछ ऐसा हाल आज भारत की अधिकतर युवा आबादी का हो चूका है।

माता-पिता की उम्मीदें होती है कि बेटा बड़ा होकर परिवार का भार कंधो पर लेगा, हमें आराम करने का अवसर देगा, पर बेटा बड़ा होकर उन्हें राहत देने की बजाय और अधिक परेशानी में डाल देता है क्योंकि वह नशे की अंधी दुनिया में धसकर बर्बादी के रास्तों को चुन लेता है।


‌जब वह नशे की लत का गुलाम बन जाता है तो उसके लिए आजीविका व नशे की आदत की पूर्ति के लिए आवश्यक धन जुटाना मुश्किल हो जाता है। अंत में वह नशे की भूख मिटाने के लिए चोरी, डकेती, गुड़ागर्दी व तमाम आपराधिक गतिविधियां करने को मजबूर होता है। जिसका दुष्परिणाम समूचा समाज झेलता है।

‌आज-कल तो नशे के नंगे नाच का तांडव इस कदर हो चूका है कि ये नशेड़ी बहन-बेटियों की इज्जत तक लूटने से नहीं डरते।
‌वर्तमान में भारत में युवाओं की आबादी 70 फीसदी है जो राष्ट्र का नव-निर्माण बड़ी तेज गति से कर सकते है पर इनमें  से अधिकतर नशे के आदि हो चुके है, जो राष्ट्र पर बोझ बनने का काम कर रहे है।

‌इस प्रकार नशे से ग्रसित व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर बीमारी व दिशाहीनता, पारिवारिक स्तर पर तनाव, सामाजिक अपराध व राष्ट्र के लिए बोझ बनकर सामने आ रहा है।

‌अब आवश्यकता है इन भटके लोगों को जागरूक कर पुनः  सही राह दिखाने की, ताकि नशे के चंगुल से बाहर निकल सके। साथ ही सामाजिक जागरूकता की ताकि नये युवा नशे की दुनिया से अपना नाता न जोड़े।

Sunday, 29 April 2018

संकल्प शक्ति मजबूत बनाने का आसान उपाय

हम संकल्प लेते हैं , कुछ करने का निश्चय करते है तो थोड़े समय बाद उसे भूलने लगते है। हमारी उस कार्य को करने की इच्छाशक्ति कम होने लगती है। मन उस काम को नहीं करने के कई बहाने बनाने लगता है । ऐसी दशा में हम उस कार्य को करना छोड़ देते है और संकल्प वहीं धरा रह जाता है।
अब हमारे मन में सवाल उठता है कि ऐसी कोई तकनीक है जो संकल्प शक्ति को मजबूत बनाए ताकि हम निर्धारित कार्य को पूरी क्षमता के साथ कर सके। जी हां यह बड़ा आसान काम है। बस आवश्यकता है मन के विज्ञान को समझने की।
जैसे ठोस, द्रव व गैस पदार्थ की तीन आयाम होते है वैसे ही चेतन, अचेतन व पराचेतन ये तीनों हमारे मन के आयाम होते हैं ।
जागते समय व सामान्य बातचीत का सम्बन्ध चेतन मन से, नींद व सपनों का सम्बन्ध अचेतन मन से एवं ध्यान-समाधि का सम्बन्ध पराचेतन मन से होता है। 
आश्चर्य की बात तो यह है सामान्य तौर पर हम अपनी सारी ऊर्जा चेतन मन पर ही लगाते है। इसकी तुलना में अचेतन व पराचेतन मन बहुत शक्तिशाली होते है  पर हम इनका का उपयोग नहीं कर पाते। क्योंकि हमें ये जानकारी  नहीं है कि मन के भी इतने आयाम होते है। और यदि यह पता भी हो तो उपयोग की तकनीक भी आनी चाहिए। तो मैं अब आपको बताता हूँ अचेतन मन का प्रयोग करने की तरकीब। साथ में ये भी कैसे अचेतन मन से संकल्प शक्ति को बढ़ाते है ? 
रात में जब हम सोते है तो नींद लेते समय जो अंतिम विचार होता है वही सपने में आता है। अर्थात वह विचार अचेतन मन में चला जाता है। मतलब अचेतन मन को साधने की तकनीक ये है कि सोते समय उन विचारों का चिंतन करे जिन्हें अचेतन मन में घुसाना है। यदि आप चाहते हो हमारा संकल्प अचेतन मन में प्रवेश करे ताकि उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाए। तो आप जब सोने के लिए बिस्तर पर लेटते हो तो अपने संकल्प का पांच मिनट जर
ध्यान जरूर करे। यदि ऐसा निरंतर करोंगे तो आप पाओंगे कि आपकी संकल्प शक्ति मजबूत हो रही है जिससे आपको उस कार्य से जुड़े परिणाम भी अच्छे मिलने लगेंगे।

Monday, 2 April 2018

ध्यान से बदले जीवन की दशा व दिशा

मन की स्थिरता से बने संकल्पवान 

हमारा मन चंचल होता है, जिसमें विचारों का प्रवाह हर घड़ी चलता रहता है। कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक विचार आते है। सकारात्मक विचारों से सुख की वहीं नकारात्मक विचारों से दुःख की अनुभूति होती है। सोते-सोते सपनों में भी विचारों का सागर उमड़ने लगता है। मन में चल रहा ये विचारों का प्रवाह एक क्षण में हजारों मील की यात्रा कर सकता है। ये सब अस्थिर मन की पहचान है।
हम चाहे तो मन को एकाग्र व स्थिर कर सकते है। उसकी चंचलता को दूर कर सकते है। ऐसा करने के लिए अभ्यास व वैराग्य की जरूरत होती है। यदि मन को वस में कर लिया जाए तो वैचारिक ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होगा। जिससे इच्छा शक्ति भी मजबूत होगी और व्यक्ति संकल्पवान बन जाएगा।

मन रहे मस्त तो  बीमारी पस्त

यदि मनोरोग है तो शारीरिक बीमारी होना स्वभाविक है। दूसरी तरफ शारीरिक व्याधी है तो मन में विषाद होगा। पर मन को मजबूत बनाकर सकारात्मक चिंतन से शारीरिक बीमारी को मात दी जा सकती है। वहीं मानसिक बीमारी को ठीक करने के लिए भौतिक प्रयास पर्याप्त नहीं है उसे जड़ से मिटाने के लिए ध्यान अच्छा माध्यम हो सकता है।
मन जीवन की छत के समान है, जिससे रिस-रिसकर परेशानियां टपकती है, जो संग्रहित होने पर चिंता, अवसाद व तनाव का कारण बनती है। इससे व्यक्ति की भूख व नींद भी चली जाती है। तरह-तरह की बीमारियों का आक्रमण होता है। उससे प्रभावित व्यक्ति का जीवन दुःखमय हो जाता है।
ऐसी दशा से बचने के लिए ध्यान बेहतर उपाय हो सकता है। ध्यान से मन व शरीर में तादात्मय होता है। इस प्रकार जीवन को संवारने की कला का नाम ध्यान है।
सामान्यतया लोग दुःखी व्यक्ति से बात करना पसंद नहीं करते है। यदि हम प्रसन्न है तो हर कोई हमसे जुड़ना चाहता है। प्रसन्नता का द्वार मन है। यदि मन  प्रसन्न, खुश व प्रफुल्लित हो तो जीवन भी सुखमय होगा।


सुसंगती से वैचारिक पवित्रता

वैचारिक प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक वातावरण होता है, जिस वातावरण में व्यक्ति रहता है, उसका प्रभाव उसके चिंतन पर जरूर पड़ता है। वह जिनकी संगती करता है, उन लोगों के गुण व दुर्गुण से वह प्रभावित होता है। यदि बुरी संगती है तो उस पर भी बुराईयां की परत चढ़नी शरू हो जाती है। जिसका परिणाम असंतुष्टि, आतुरता व बैचेनी के रूप में सामने आता है। अतः हमें ऐसे लोगों की संगती से बचकर अच्छे लोगों की संगती करनी चाहिए। सुसंगती से विचार पवित्र रहते है साथ ही जीवन को  सकारात्मक दिशा मिलती है।

धरती की समस्त ऊर्जा का स्रोत सुर्य

बिना सुर्य धरती पर जीवन संभव नहीं है, जड़ से लेकर चेतन तक की ऊर्जा का स्रोत सुर्य है। समस्त धरती का भरण-पोषण सुर्य की ऊर्जा से होता है। विज्ञान कहता है धरती की प्राथमिक ऊर्जा का स्रोत सर्य है। उदयीमान सुर्य को सविता कहते है। सविता से विटामीन-डी मिलता है जो शरीर के लिए आवश्यक तत्व है।
सुर्य  सतत् कर्मशील रहने की प्रेरणा देता है। इसे आदित्य, रवि, मित्र, भानु, खग, भुषण, भास्कर, हिरण्यगर्भ, मारिद्र, सविद्र व अरक के नाम से भी जाना जाता है।

जैविक घड़ी के साथ बिठाएं संतुलन

भारतीय संस्कृति में सविता को पवित्रता, प्रखरता व प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। यहां सविता के दर्शन को शुभ माना जाता है। आदर्श दिनचर्या सुर्य से जुड़ी होती है। सुर्य के आगमन, दिन के मध्यकाल व सुर्य गमन को त्रिकाल संध्या कहा जाता है। त्रिकाल संध्या में ईश्वर को स्मरण किया जाता है।हमारी जैविक घड़ी शयन, जागरण के साथ शरीर की अन्य गतिविधियों के समय का संकेत देती है। यदि हमारी तादतम्यता जैविक घड़ी के साथ हो तो हम स्वस्थ रहते है। अतः हमें सुर्योदय से लेकर सुर्यास्त तक व उसके बाद हमारी दिनचर्या को सुव्यवस्थित बनाना चाहिए। ताकि जैविक घड़ी के साथ संतुलन बना रहे और हम स्वस्थ बने रहे।

सुर्योपासना

सुर्य की उपासना से आयु, विद्या, यश व बल की प्राप्ति होती है। आयु व बल शारीरिक क्षमता है तो विद्या व यश मानसिक साम्थ्र्य है। सविता की उपासना गायत्री मंत्र से की जाती है। ’’यत पिण्डे , तत् ब्रहमाण्डे’’ यानी जो पिण्ड में है वहीं ब्रहमाण्ड में है। इस प्रकार सुर्य बाह्य बाह्य जगत में भी है और आन्तरिक जगत में भी। इस ब्रहमाण्ड रूपी जगत में सुर्य जीवंत-जाग्रत प्रतीमा है। इसका हम जैसे-जैसे ध्यान करेंगे वैसे-वैसे हमारा मन इसमें डूबता चला जाएगा, चिंतन की शैली बदल जाएगी। सबसे खास बात यह है कि हम सविता के ध्यान के साथ जितनी तन्मयता से गायत्री मंत्र का जप करेंगे। उतना  अधिक फायदा हमें मिलेगा। परिणाम स्वरूप उपासक का ओजस्, तेजस् व वर्चस् भी बढे़गा। जिस प्रकार बारीश के पानी से धरती की उर्वरता बढ़ती है उसी प्रकार सुर्योपासना से जीवन की उर्वरता में वृद्धि होती है।
सविता के ध्यान से अन्तर्जगत का सुर्य चमकने लगता है। निरंतर व नियमित सुर्योपासना से उपासक सुर्य सिद्ध साधक बन जाता है।


गायत्री मंत्र का अर्थ

गायत्री मंत्र में 24 अक्षर व 9 शब्द होते है। जो क्रमशः वेदों की शाखाओं व ग्रहों का प्रतीक होते है।
गायत्री मन्त्र, इस समस्त ब्रह्माण्ड और समस्त व्याप्त जीवित जगत के कल्याण का सबसे बड़ा स्रोत है। इसे वेदों का सार भी माना जाता है।
इस मन्त्र के जाप से सभी प्रकार के मानसिक अथवा शारीरिक विकार दूर हो जाते हैं। गायत्री मन्त्र के जाप से ह्रदय में शुद्धता आती है और विचार सकारात्मक हो जाते हैं। शरीर में एक अदभुत शक्ति का संचार होता है।


    ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
    भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।


ॐ = मंत्र का मुकूट
भू = सम्पूर्ण जगत के जीवन का आधार और प्राणों से भी प्रिय
भुवः = सभी दुःखों से रहित, जिसके संग से सभी दुखों का नाश हो जाता है
स्वः = वो स्वयंरू, जो सम्पूर्ण जगत का धारण करते हैं
तत् = उसी परमात्मा के रूप को हम सभी
सवितु = जो सम्पूर्ण जगत का उत्पादक है
र्वरेण्यं = जो स्वीकार करने योग्य अति श्रेष्ठ है
भर्गो = शुद्ध स्वरूप और पवित्र करने वाला चेतन स्वरूप है
देवस्य = भगवान स्वरूप जिसकी प्राप्ति सभी करना चाहते हैं
धीमहि = धारण करें
धियो = बुद्धि को
यो = जो देव परमात्मा
नः = हमारी
प्रचोदयात् = प्रेरित करें

  अर्थात्  उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।


सन्दर्भ -  कुलाधिपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय  श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या जी की ध्यान कक्षा (29 मार्च 2018)



Sunday, 25 March 2018

हेस्को द्वारा पारम्परिक संसाधनों का ऐसा नियोजन, जिससे पर्यावरण के साथ स्थानीय लागों को भी फायदा


आज पूरी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप सहारा रेगिस्तान में बर्फबारी, जोहन्सबर्ग में जलसंकट एवं ऋतुओं के आने-जाने के समय में असंतुलन  देखा जा सकता है।  सभी देशों की सरकारें इस पर अनेकों योजनाएं बना तो रही है, जलवायु सम्मेलनों का आयोजन भी कर रही है पर कोई ठोस परिणाम निकलता नहीं दिखाई दे रहा है।

ऐसी चिंताजनक परिस्थितियों में कुछ गैर सरकारी संगठन ऐसे भी है, जो पर्यावरण मित्र बन प्रकृति पुत्र होने का दायित्व निभा रहे है। उनमें से एक है- हेस्को (हिमालियन एनवारमेंटल स्टडीज एंड कन्जर्वेशन आॅर्गेनाईजेशन)।




आज हमने हेस्को की कार्यप्रणाली को समझने के लिए इसके सेन्टर पर जाने का निश्चय किया।यह उत्तराखण्ड की  राजधानी देहरादून से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर स्थित है।  इस दूरी को तय कर, तकरीबन 800 मीटर पैदल चलने के बाद आइसोटोप हाइड्रोलोजी रिसर्च सेन्टर की इमारत दिखाई दी, जो कि हेस्को का सेन्टर था। सेन्टर के काॅन्फे्रन्स हाॅल में संगठन की सदस्या डाॅ़ किरण नेगी ने हेस्को के उद्देश्य व कार्यप्रणाली पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि हेस्को एक एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) है, जिसकी स्थापना पद्मश्री डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी ने की। पद्मश्री, राष्ट्रपति पुरस्कार व अन्य कई अंलकारो से नवाजे जा चुके डाॅ. जोशी के अब तक के सफर की बात करे तो पहले वे जब बाॅटनी के प्रोफेसर थे तब से ही उनका पर्यावरण के प्रति गहरा रूझान था। उन्हें अपने काम से जब भी खाली समय मिलता तो वे जंगल में जाकर पर्यावरण संरक्षण का काम करते। इससे उनका यह रूझान समय के साथ आस्था में बदल गया और उन्होंने हेस्को का गठन किया।  जिसका उद्देश्य पर्यावरण का हितैषी बन ग्रामीणों के कल्याण के लिए कार्य करना है। क्योंकि ग्रामीण ही जल, जंगल, जमीन व स्वच्छ वायु के असली मालिक हैं और यही इनकी सच्ची ताकत है।

हेस्को प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर से बेहतर उपयोग करने की तकनीकी पर कार्य कर रही है।

ऐसे जीता लोगों का विश्वास

डाॅ. नेगी ने बताया कि हेस्को के प्रारम्भिक दिनों में सबसे बड़ी चुनौती लोगों का विश्वास  जीतना था। यह तभी सम्भव हो पाया जब लोगों की आधारभूत समस्याओं का समाधान हुआ। शुरूआत में डाॅ. जोशी ने स्थानीय लोगों की मूलभूत समस्याओं को जाना और उनके समाधान पर काम किया। पानी की किल्लत को दूर करने से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध कराने तक, जब हर विषय पर काम किया गया तब लोगों को लगा कि वाक्ई में ये लोग हमारे हित में कार्य कर रहे हैं।
हेस्को ने स्थानीय पारम्परिक संसाधनों को उन्नत बनाकर लोगों तक पहुँचाया।

हेस्को की कामयाबी को बयां करती ये कहानियां


1. बुरांश को बनाया लोगों की आजीविका का साधन

1990 में हेस्को ने पहाड़ों में मिलने वाले बुरांश के फूलों से जूस बनाने का प्रयोग शुरू किया। समय के साथ इसका प्रचलन इतना बढ़ा कि आज उत्तराखण्ड आने वाले यात्री बुरांश के जूस की सबसे अधिक मांग करते है। यह आज हजारों लोगों की आजीविका का साधन बन चुका है।

2. कोदे के आटे का कमाल

पहले पहाड में लोग कोदे की रोटी खाया करते थे। जिसका रंग में भूरा होता है इस कारण, दिखावे के इस युग में लोगों ने इसे खाने से परहेज करना शुरू कर दिया। जब हेस्को को यह पता चला तो इस संगठन ने इस पर काम किया कि कोदे के आटे की क्या खासियत है और इसे कैसे अधिक लोगों तक पहुँचाया जाए ? तो मालूम हुआ कि इसमें कैल्शियम की प्रचुरता होती है। तो हेस्को ने इसके बहुत सारे उत्पाद बनाने शुरू किए और यह माॅडल ग्रामीणों तक पहुँचाया। आज इससे बनने वाले पौष्टिक उत्पादों की बाजार में खूब मांग है, जिससे अब लोग इसे बेचने में शर्माते नहीं है वरन् गर्व महसुस करते है।

3. नदियों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया

हिमालय जो पांच देशों में नदियों के पानी का स्रोत है और वहां के लोगों को ही पानी की कमी का सामना करना पड़े, इससे अधिक चिंताजनक बात क्या हो सकती है। इसी चिंता को दूर करने के लिए हेस्को ने छोटी-छोटी नदियों को पुनर्जिवित करने का बीड़ा उठाया।
देहरादून वन विभाग की आशारोड़ी रेंज में पड़ने वाले शुक्लापुर का जंगल वीरान हो चला था। 2010 में हेस्को की तकनीकी सहायता से 44 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जंगल में वर्षा जल संरक्षण की पहल शुरू की गई। हेेस्को के मुताबिक इस प्रयोग का लक्ष्य इस वन क्षेत्र से जुड़ी छोटी आसन नदी को जीवित करने के साथ ही वनाग्नि की रोकथाम हुई। इस वन भूमि में एक हजार वाटर होल और तीन बड़े तालाब बनाने के साथ ही 181 चैकडेम तैयार किए गए।

यही नहीं, ऐसी वन प्रजातियों का रोपण किया गया, जो जल संरक्षण में सहायक होने के साथ-साथ वन्यजीवों के लिए खाद्य श्रंखला भी तैयार करें। नतीजा यह हुआ कि आज छोटी आसन नदी के जल में 200 एलपीएम पानी की मात्रा बढ़ी है। साथ ही तब से आज तक जंगल में आग नहीं लगी। सबसे अच्छी बात क्षेत्रवासियों के पानी की किल्लत दूर हो गई।

4.  कम इंधन के प्रयोग से मल्टी पर्पस चूल्हा

हेस्को द्वारा विकसित दक्ष चूल्हा पारम्परिक चूल्हे का नया वर्जन है। जिसकी खासियत यह है कि वह कम ईधन में अधिक देर तक चलता है, एक साथ दो से तीन खाद्य पदार्थाें को पका सकता है। यानि यह मल्टी प्रपज चूल्हा है।

  गोबर से बनने वाले ऊपलो को भी हेस्को ने नए रूप में पेश किया। जिससे यह ऊपले पूरी तरह से जल पाते है। 
इनके अलावा बायो गैस को भी हेस्को सरल पर सधे रूप से लोगों तक पहँचाने का कार्य कर रहा है। इस प्रकार हेस्को परम्परागत संसाधनों को और अधिक विकसित कर लोगों तक पहँचा रहा है। जिससे स्थानीय लोगों को फायदा होने के साथ यह पर्यावरण के लिए भी वरदान साबित हो रहा है। अतः हेस्को हिमालय की धरोहर पर्यावरण व पानी को संरक्षित कर समाज कल्याण की दिशा में सराहनीय कार्य कर रहा है। जिसका लाभ हिमालयी राज्यों के साथ समूचे देश को हो रहा है। पर्यावरण सबसे जुड़ा मुद्दा है क्योंकि हर कोई सांस लेता है, हर किसी को शुद्ध पानी की चाहत होती है।