Sunday, 29 April 2018

संकल्प शक्ति मजबूत बनाने का आसान उपाय

हम संकल्प लेते हैं , कुछ करने का निश्चय करते है तो थोड़े समय बाद उसे भूलने लगते है। हमारी उस कार्य को करने की इच्छाशक्ति कम होने लगती है। मन उस काम को नहीं करने के कई बहाने बनाने लगता है । ऐसी दशा में हम उस कार्य को करना छोड़ देते है और संकल्प वहीं धरा रह जाता है।
अब हमारे मन में सवाल उठता है कि ऐसी कोई तकनीक है जो संकल्प शक्ति को मजबूत बनाए ताकि हम निर्धारित कार्य को पूरी क्षमता के साथ कर सके। जी हां यह बड़ा आसान काम है। बस आवश्यकता है मन के विज्ञान को समझने की।
जैसे ठोस, द्रव व गैस पदार्थ की तीन आयाम होते है वैसे ही चेतन, अचेतन व पराचेतन ये तीनों हमारे मन के आयाम होते हैं ।
जागते समय व सामान्य बातचीत का सम्बन्ध चेतन मन से, नींद व सपनों का सम्बन्ध अचेतन मन से एवं ध्यान-समाधि का सम्बन्ध पराचेतन मन से होता है। 
आश्चर्य की बात तो यह है सामान्य तौर पर हम अपनी सारी ऊर्जा चेतन मन पर ही लगाते है। इसकी तुलना में अचेतन व पराचेतन मन बहुत शक्तिशाली होते है  पर हम इनका का उपयोग नहीं कर पाते। क्योंकि हमें ये जानकारी  नहीं है कि मन के भी इतने आयाम होते है। और यदि यह पता भी हो तो उपयोग की तकनीक भी आनी चाहिए। तो मैं अब आपको बताता हूँ अचेतन मन का प्रयोग करने की तरकीब। साथ में ये भी कैसे अचेतन मन से संकल्प शक्ति को बढ़ाते है ? 
रात में जब हम सोते है तो नींद लेते समय जो अंतिम विचार होता है वही सपने में आता है। अर्थात वह विचार अचेतन मन में चला जाता है। मतलब अचेतन मन को साधने की तकनीक ये है कि सोते समय उन विचारों का चिंतन करे जिन्हें अचेतन मन में घुसाना है। यदि आप चाहते हो हमारा संकल्प अचेतन मन में प्रवेश करे ताकि उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाए। तो आप जब सोने के लिए बिस्तर पर लेटते हो तो अपने संकल्प का पांच मिनट जर
ध्यान जरूर करे। यदि ऐसा निरंतर करोंगे तो आप पाओंगे कि आपकी संकल्प शक्ति मजबूत हो रही है जिससे आपको उस कार्य से जुड़े परिणाम भी अच्छे मिलने लगेंगे।

Monday, 2 April 2018

ध्यान से बदले जीवन की दशा व दिशा

मन की स्थिरता से बने संकल्पवान 

हमारा मन चंचल होता है, जिसमें विचारों का प्रवाह हर घड़ी चलता रहता है। कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक विचार आते है। सकारात्मक विचारों से सुख की वहीं नकारात्मक विचारों से दुःख की अनुभूति होती है। सोते-सोते सपनों में भी विचारों का सागर उमड़ने लगता है। मन में चल रहा ये विचारों का प्रवाह एक क्षण में हजारों मील की यात्रा कर सकता है। ये सब अस्थिर मन की पहचान है।
हम चाहे तो मन को एकाग्र व स्थिर कर सकते है। उसकी चंचलता को दूर कर सकते है। ऐसा करने के लिए अभ्यास व वैराग्य की जरूरत होती है। यदि मन को वस में कर लिया जाए तो वैचारिक ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होगा। जिससे इच्छा शक्ति भी मजबूत होगी और व्यक्ति संकल्पवान बन जाएगा।

मन रहे मस्त तो  बीमारी पस्त

यदि मनोरोग है तो शारीरिक बीमारी होना स्वभाविक है। दूसरी तरफ शारीरिक व्याधी है तो मन में विषाद होगा। पर मन को मजबूत बनाकर सकारात्मक चिंतन से शारीरिक बीमारी को मात दी जा सकती है। वहीं मानसिक बीमारी को ठीक करने के लिए भौतिक प्रयास पर्याप्त नहीं है उसे जड़ से मिटाने के लिए ध्यान अच्छा माध्यम हो सकता है।
मन जीवन की छत के समान है, जिससे रिस-रिसकर परेशानियां टपकती है, जो संग्रहित होने पर चिंता, अवसाद व तनाव का कारण बनती है। इससे व्यक्ति की भूख व नींद भी चली जाती है। तरह-तरह की बीमारियों का आक्रमण होता है। उससे प्रभावित व्यक्ति का जीवन दुःखमय हो जाता है।
ऐसी दशा से बचने के लिए ध्यान बेहतर उपाय हो सकता है। ध्यान से मन व शरीर में तादात्मय होता है। इस प्रकार जीवन को संवारने की कला का नाम ध्यान है।
सामान्यतया लोग दुःखी व्यक्ति से बात करना पसंद नहीं करते है। यदि हम प्रसन्न है तो हर कोई हमसे जुड़ना चाहता है। प्रसन्नता का द्वार मन है। यदि मन  प्रसन्न, खुश व प्रफुल्लित हो तो जीवन भी सुखमय होगा।


सुसंगती से वैचारिक पवित्रता

वैचारिक प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक वातावरण होता है, जिस वातावरण में व्यक्ति रहता है, उसका प्रभाव उसके चिंतन पर जरूर पड़ता है। वह जिनकी संगती करता है, उन लोगों के गुण व दुर्गुण से वह प्रभावित होता है। यदि बुरी संगती है तो उस पर भी बुराईयां की परत चढ़नी शरू हो जाती है। जिसका परिणाम असंतुष्टि, आतुरता व बैचेनी के रूप में सामने आता है। अतः हमें ऐसे लोगों की संगती से बचकर अच्छे लोगों की संगती करनी चाहिए। सुसंगती से विचार पवित्र रहते है साथ ही जीवन को  सकारात्मक दिशा मिलती है।

धरती की समस्त ऊर्जा का स्रोत सुर्य

बिना सुर्य धरती पर जीवन संभव नहीं है, जड़ से लेकर चेतन तक की ऊर्जा का स्रोत सुर्य है। समस्त धरती का भरण-पोषण सुर्य की ऊर्जा से होता है। विज्ञान कहता है धरती की प्राथमिक ऊर्जा का स्रोत सर्य है। उदयीमान सुर्य को सविता कहते है। सविता से विटामीन-डी मिलता है जो शरीर के लिए आवश्यक तत्व है।
सुर्य  सतत् कर्मशील रहने की प्रेरणा देता है। इसे आदित्य, रवि, मित्र, भानु, खग, भुषण, भास्कर, हिरण्यगर्भ, मारिद्र, सविद्र व अरक के नाम से भी जाना जाता है।

जैविक घड़ी के साथ बिठाएं संतुलन

भारतीय संस्कृति में सविता को पवित्रता, प्रखरता व प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। यहां सविता के दर्शन को शुभ माना जाता है। आदर्श दिनचर्या सुर्य से जुड़ी होती है। सुर्य के आगमन, दिन के मध्यकाल व सुर्य गमन को त्रिकाल संध्या कहा जाता है। त्रिकाल संध्या में ईश्वर को स्मरण किया जाता है।हमारी जैविक घड़ी शयन, जागरण के साथ शरीर की अन्य गतिविधियों के समय का संकेत देती है। यदि हमारी तादतम्यता जैविक घड़ी के साथ हो तो हम स्वस्थ रहते है। अतः हमें सुर्योदय से लेकर सुर्यास्त तक व उसके बाद हमारी दिनचर्या को सुव्यवस्थित बनाना चाहिए। ताकि जैविक घड़ी के साथ संतुलन बना रहे और हम स्वस्थ बने रहे।

सुर्योपासना

सुर्य की उपासना से आयु, विद्या, यश व बल की प्राप्ति होती है। आयु व बल शारीरिक क्षमता है तो विद्या व यश मानसिक साम्थ्र्य है। सविता की उपासना गायत्री मंत्र से की जाती है। ’’यत पिण्डे , तत् ब्रहमाण्डे’’ यानी जो पिण्ड में है वहीं ब्रहमाण्ड में है। इस प्रकार सुर्य बाह्य बाह्य जगत में भी है और आन्तरिक जगत में भी। इस ब्रहमाण्ड रूपी जगत में सुर्य जीवंत-जाग्रत प्रतीमा है। इसका हम जैसे-जैसे ध्यान करेंगे वैसे-वैसे हमारा मन इसमें डूबता चला जाएगा, चिंतन की शैली बदल जाएगी। सबसे खास बात यह है कि हम सविता के ध्यान के साथ जितनी तन्मयता से गायत्री मंत्र का जप करेंगे। उतना  अधिक फायदा हमें मिलेगा। परिणाम स्वरूप उपासक का ओजस्, तेजस् व वर्चस् भी बढे़गा। जिस प्रकार बारीश के पानी से धरती की उर्वरता बढ़ती है उसी प्रकार सुर्योपासना से जीवन की उर्वरता में वृद्धि होती है।
सविता के ध्यान से अन्तर्जगत का सुर्य चमकने लगता है। निरंतर व नियमित सुर्योपासना से उपासक सुर्य सिद्ध साधक बन जाता है।


गायत्री मंत्र का अर्थ

गायत्री मंत्र में 24 अक्षर व 9 शब्द होते है। जो क्रमशः वेदों की शाखाओं व ग्रहों का प्रतीक होते है।
गायत्री मन्त्र, इस समस्त ब्रह्माण्ड और समस्त व्याप्त जीवित जगत के कल्याण का सबसे बड़ा स्रोत है। इसे वेदों का सार भी माना जाता है।
इस मन्त्र के जाप से सभी प्रकार के मानसिक अथवा शारीरिक विकार दूर हो जाते हैं। गायत्री मन्त्र के जाप से ह्रदय में शुद्धता आती है और विचार सकारात्मक हो जाते हैं। शरीर में एक अदभुत शक्ति का संचार होता है।


    ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
    भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।


ॐ = मंत्र का मुकूट
भू = सम्पूर्ण जगत के जीवन का आधार और प्राणों से भी प्रिय
भुवः = सभी दुःखों से रहित, जिसके संग से सभी दुखों का नाश हो जाता है
स्वः = वो स्वयंरू, जो सम्पूर्ण जगत का धारण करते हैं
तत् = उसी परमात्मा के रूप को हम सभी
सवितु = जो सम्पूर्ण जगत का उत्पादक है
र्वरेण्यं = जो स्वीकार करने योग्य अति श्रेष्ठ है
भर्गो = शुद्ध स्वरूप और पवित्र करने वाला चेतन स्वरूप है
देवस्य = भगवान स्वरूप जिसकी प्राप्ति सभी करना चाहते हैं
धीमहि = धारण करें
धियो = बुद्धि को
यो = जो देव परमात्मा
नः = हमारी
प्रचोदयात् = प्रेरित करें

  अर्थात्  उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।


सन्दर्भ -  कुलाधिपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय  श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या जी की ध्यान कक्षा (29 मार्च 2018)



Sunday, 25 March 2018

हेस्को द्वारा पारम्परिक संसाधनों का ऐसा नियोजन, जिससे पर्यावरण के साथ स्थानीय लागों को भी फायदा


आज पूरी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप सहारा रेगिस्तान में बर्फबारी, जोहन्सबर्ग में जलसंकट एवं ऋतुओं के आने-जाने के समय में असंतुलन  देखा जा सकता है।  सभी देशों की सरकारें इस पर अनेकों योजनाएं बना तो रही है, जलवायु सम्मेलनों का आयोजन भी कर रही है पर कोई ठोस परिणाम निकलता नहीं दिखाई दे रहा है।

ऐसी चिंताजनक परिस्थितियों में कुछ गैर सरकारी संगठन ऐसे भी है, जो पर्यावरण मित्र बन प्रकृति पुत्र होने का दायित्व निभा रहे है। उनमें से एक है- हेस्को (हिमालियन एनवारमेंटल स्टडीज एंड कन्जर्वेशन आॅर्गेनाईजेशन)।




आज हमने हेस्को की कार्यप्रणाली को समझने के लिए इसके सेन्टर पर जाने का निश्चय किया।यह उत्तराखण्ड की  राजधानी देहरादून से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर स्थित है।  इस दूरी को तय कर, तकरीबन 800 मीटर पैदल चलने के बाद आइसोटोप हाइड्रोलोजी रिसर्च सेन्टर की इमारत दिखाई दी, जो कि हेस्को का सेन्टर था। सेन्टर के काॅन्फे्रन्स हाॅल में संगठन की सदस्या डाॅ़ किरण नेगी ने हेस्को के उद्देश्य व कार्यप्रणाली पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि हेस्को एक एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) है, जिसकी स्थापना पद्मश्री डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी ने की। पद्मश्री, राष्ट्रपति पुरस्कार व अन्य कई अंलकारो से नवाजे जा चुके डाॅ. जोशी के अब तक के सफर की बात करे तो पहले वे जब बाॅटनी के प्रोफेसर थे तब से ही उनका पर्यावरण के प्रति गहरा रूझान था। उन्हें अपने काम से जब भी खाली समय मिलता तो वे जंगल में जाकर पर्यावरण संरक्षण का काम करते। इससे उनका यह रूझान समय के साथ आस्था में बदल गया और उन्होंने हेस्को का गठन किया।  जिसका उद्देश्य पर्यावरण का हितैषी बन ग्रामीणों के कल्याण के लिए कार्य करना है। क्योंकि ग्रामीण ही जल, जंगल, जमीन व स्वच्छ वायु के असली मालिक हैं और यही इनकी सच्ची ताकत है।

हेस्को प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर से बेहतर उपयोग करने की तकनीकी पर कार्य कर रही है।

ऐसे जीता लोगों का विश्वास

डाॅ. नेगी ने बताया कि हेस्को के प्रारम्भिक दिनों में सबसे बड़ी चुनौती लोगों का विश्वास  जीतना था। यह तभी सम्भव हो पाया जब लोगों की आधारभूत समस्याओं का समाधान हुआ। शुरूआत में डाॅ. जोशी ने स्थानीय लोगों की मूलभूत समस्याओं को जाना और उनके समाधान पर काम किया। पानी की किल्लत को दूर करने से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध कराने तक, जब हर विषय पर काम किया गया तब लोगों को लगा कि वाक्ई में ये लोग हमारे हित में कार्य कर रहे हैं।
हेस्को ने स्थानीय पारम्परिक संसाधनों को उन्नत बनाकर लोगों तक पहुँचाया।

हेस्को की कामयाबी को बयां करती ये कहानियां


1. बुरांश को बनाया लोगों की आजीविका का साधन

1990 में हेस्को ने पहाड़ों में मिलने वाले बुरांश के फूलों से जूस बनाने का प्रयोग शुरू किया। समय के साथ इसका प्रचलन इतना बढ़ा कि आज उत्तराखण्ड आने वाले यात्री बुरांश के जूस की सबसे अधिक मांग करते है। यह आज हजारों लोगों की आजीविका का साधन बन चुका है।

2. कोदे के आटे का कमाल

पहले पहाड में लोग कोदे की रोटी खाया करते थे। जिसका रंग में भूरा होता है इस कारण, दिखावे के इस युग में लोगों ने इसे खाने से परहेज करना शुरू कर दिया। जब हेस्को को यह पता चला तो इस संगठन ने इस पर काम किया कि कोदे के आटे की क्या खासियत है और इसे कैसे अधिक लोगों तक पहुँचाया जाए ? तो मालूम हुआ कि इसमें कैल्शियम की प्रचुरता होती है। तो हेस्को ने इसके बहुत सारे उत्पाद बनाने शुरू किए और यह माॅडल ग्रामीणों तक पहुँचाया। आज इससे बनने वाले पौष्टिक उत्पादों की बाजार में खूब मांग है, जिससे अब लोग इसे बेचने में शर्माते नहीं है वरन् गर्व महसुस करते है।

3. नदियों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया

हिमालय जो पांच देशों में नदियों के पानी का स्रोत है और वहां के लोगों को ही पानी की कमी का सामना करना पड़े, इससे अधिक चिंताजनक बात क्या हो सकती है। इसी चिंता को दूर करने के लिए हेस्को ने छोटी-छोटी नदियों को पुनर्जिवित करने का बीड़ा उठाया।
देहरादून वन विभाग की आशारोड़ी रेंज में पड़ने वाले शुक्लापुर का जंगल वीरान हो चला था। 2010 में हेस्को की तकनीकी सहायता से 44 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जंगल में वर्षा जल संरक्षण की पहल शुरू की गई। हेेस्को के मुताबिक इस प्रयोग का लक्ष्य इस वन क्षेत्र से जुड़ी छोटी आसन नदी को जीवित करने के साथ ही वनाग्नि की रोकथाम हुई। इस वन भूमि में एक हजार वाटर होल और तीन बड़े तालाब बनाने के साथ ही 181 चैकडेम तैयार किए गए।

यही नहीं, ऐसी वन प्रजातियों का रोपण किया गया, जो जल संरक्षण में सहायक होने के साथ-साथ वन्यजीवों के लिए खाद्य श्रंखला भी तैयार करें। नतीजा यह हुआ कि आज छोटी आसन नदी के जल में 200 एलपीएम पानी की मात्रा बढ़ी है। साथ ही तब से आज तक जंगल में आग नहीं लगी। सबसे अच्छी बात क्षेत्रवासियों के पानी की किल्लत दूर हो गई।

4.  कम इंधन के प्रयोग से मल्टी पर्पस चूल्हा

हेस्को द्वारा विकसित दक्ष चूल्हा पारम्परिक चूल्हे का नया वर्जन है। जिसकी खासियत यह है कि वह कम ईधन में अधिक देर तक चलता है, एक साथ दो से तीन खाद्य पदार्थाें को पका सकता है। यानि यह मल्टी प्रपज चूल्हा है।

  गोबर से बनने वाले ऊपलो को भी हेस्को ने नए रूप में पेश किया। जिससे यह ऊपले पूरी तरह से जल पाते है। 
इनके अलावा बायो गैस को भी हेस्को सरल पर सधे रूप से लोगों तक पहँचाने का कार्य कर रहा है। इस प्रकार हेस्को परम्परागत संसाधनों को और अधिक विकसित कर लोगों तक पहँचा रहा है। जिससे स्थानीय लोगों को फायदा होने के साथ यह पर्यावरण के लिए भी वरदान साबित हो रहा है। अतः हेस्को हिमालय की धरोहर पर्यावरण व पानी को संरक्षित कर समाज कल्याण की दिशा में सराहनीय कार्य कर रहा है। जिसका लाभ हिमालयी राज्यों के साथ समूचे देश को हो रहा है। पर्यावरण सबसे जुड़ा मुद्दा है क्योंकि हर कोई सांस लेता है, हर किसी को शुद्ध पानी की चाहत होती है।
                                                                                                       

Sunday, 11 February 2018

यदि ऐसा हो जाए तो बदल सकती है भारत की तस्वीर

वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने  नागपुर में एक धार्मिक संगठन की विशाल सभा को सम्बोधित किया। इस सभा में उन्होंने एक प्रस्ताव रखा। वैसे तो राजनेता अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने के लिए धार्मिक संगठनों के पास जाते है मगर इस बार राजनैतिक स्वार्थ से हटकर गडकरी ने एक नई पहल की। वह पहल गंगा ग्राम तीर्थ बनाने में विश्वसनीय धार्मिक संगठनों से  सहयोग मांगने की थी। इसका सकारात्मक जवाब भी उन्हें मिला।
इससे मेरे मन में विचार आया कि यदि राजतंत्र यानी सरकार व धर्मतंत्र मिलकर कार्य करे तो देश का विकास और अधिक रफ्तार से हो सकता है। क्योंकि राजतंत्र के पास आर्थिक शक्ति होती है, वहीं धर्मतंत्र के पास नैतिक सामर्थ्य होता है। सरकार की प्रशासनिक पकड़ मजबूत होती है वहीं धार्मिक संगठनों की जनपकड़ अच्छी होती है, समाज की अंतिम पक्ति का तबका सरकार की नहीं बल्कि धर्म गुरुओं की शरण में जाना पंसद करता है। इसलिये दोनों तंत्रों का मिलकर काम करना जरूरी है।


दुर्भाग्य से आज के हालात बहुत दयनीय है। क्योंकि  एक तरफ राजनेताओं में नैतिकता का पतन हो रहा है, जिसका दुष्प्रभाव भ्र्ष्टाचार, साम्प्रदायिक तनाव व बेतुकी बयानबाजी के रूप में देखा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर धर्मतंत्र से आसाराम, राम रहीम व रामपाल जैसे पाखण्डी लोग पकड़े जा रहे है, जिसका परिणाम लोगों की धर्म के प्रति घटती आस्था के रूप में देखा जा सकता है। 
हाल ही में राम रहीम की काली करतूतों पर हरियाणा सरकार ने पर्दा डालने का पुरजोर प्रयास किया पर कोर्ट की सख्ती के चलते सरकार के मंसूबे पूरे नहीं हुए। यहां राजतंत्र का दायित्व बाबा को उनके पाखण्ड की सजा दिलाने का था न की अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का। दूसरी तरफ कई धर्म गुरु भी स्वार्थ में आकर उन नेताओं का समर्थन कर बैठते है, जो देश के लिए घातक सिद्ध होते है। यह नेता भड़काऊ बयानबाजी कर समाज को  बांटते है। 
भारत का इतिहास इस बात गवाह है कि एक सफल राजतंत्र के पीछे हमेशा धर्म तंत्र  का हाथ रहा है चाहे वह कृष्ण के साथ उनके गुरु उपमन्यु  का हो या राम के साथ महर्षि वशिष्ठ का हो या फिर चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ चाणक्य का हो। अब बदली परिस्तिथियों में भले ही पूरानी तरह आपसी समन्वय न हो पर राष्ट्रहित के लिए दोनों तंत्र एक-दूसरे का सहयोग कर सकते है।
आज राजनीति को नैतिकता की जरूरत है, जिसकी पूर्ति धर्म से हो सकती है। वहीं धर्म को  को मोक्ष की राह देखने वाले लोगों की तलाश है। और यह तलाश ईमानदार राजनेता पूरी कर सकते है। क्योंकि अधिकतर लोगों को दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती है, यदि वो आसानी से मिल जाए तो वे मोक्ष के बारे में सोचे। जिनकी सहायता ईमानदार  राजसेवक कर सकते है। 
अतः दोनों मिलकर कार्य करे तो भारत की तमाम समस्याओं का समाधान हो सकता है। और भारत पुनः जगतगुरु बन सकता है।
इन सब के बीच एक बात ध्यान रहे है कि मैंने उन धार्मिक संगठनों की बात की है जो मानवता के धर्म को प्राथमिकता देते है, जो विविधता में एकता की संस्कृति का संरक्षण करते है, जो मंदिर-मस्जिद पर झगड़ने की बजाय लोगों के दिलों को मंदिर बनाने का कार्य करते हो, जिनका लक्ष्य राष्ट्र के नवनिर्माण का हो। और ऐसे संगठनों की पहचान किसी से छीपी नहीं है उदाहरण के तौर पर गायत्री परिवार को देखा जा सकता है, जो सप्त आंदोलन के जरिये निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा कर रहा है।

Thursday, 4 January 2018

जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है


जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है

जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है
जिसके तप से दुनिया बदली जानी है
इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य की हुंकार है
चारों दिशाओं में इसकी जय-जयकार है
जो इस ज्वाला के छाए में आया है
अपने में परिवर्तन पाया है
भावों को ऊपर उठाया है
व्यक्तित्व को महान बनाया है
यह प्रारम्भिक पोषित जिंदगानी है
जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है
जिसके तप से दुनिया बदली जानी है

विवेकानंद के विचारों पर
पूज्य गुरुदेव के पदचिन्हों पर
सब मिलकर आगे बढ़ते है
जीवन को आदर्शों से गढ़ते है
बदलते दौर की यह जवानी है
युग परिवर्तन की कहानी है
जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है
जिसके तप से दुनिया बदली जानी है ।
                               -"राजू राम"

आह ! क्या प्रसन्नता का पल था वह

 प्रसन्नता का पल

आह ! क्या प्रसन्नता का पल था वह। मन में खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। चेहरे पर मुस्कान स्वतः ही आ रही थी। जीवन का अद्भुत अहसास था। उस पल की छाप अभी भी वैसी ही है। वह पल था एक ऐसे साथी की मदद करने के बाद का, जिसका दाहिना हाथ किसी हादसे के कारण काम नहीं कर रहा था और ऊपर से उसके परीक्षा आ गई। संयोग से मुझे उसकी परीक्षा में लिखने का सौभाग्य मिला। मैं भी खुदा की कृपा से परीक्षा में लिखने में उसकी उम्मीद के अनुरूप कामयाब हो सका। जिसके बाद उसे बहुत खुशी मिली। उसकी खुशी से मुझे उस आनंद का अहसास हुआ मानों कि उसकी खुशी में मेरी प्रसन्न्ता छिपी थी। शायद इसी वजह से कहा जाता है कि सच्चे दिल से दूसरों की सहायता से जो सुख मिलता है वह कहीं और नहीं।
Image may contain: 2 people, people smiling, text

बन गई जिसकी अमिट छाया


सर्दी से सहमे दिल से निकली ये पंक्तियां-

दिल लगा है फड़कने


हरिद्वार के है ऐसे हाल
बन गया हूँ गुदड़ी लाल
चल पड़ी है शीतलहर
हो भलें रात या दोपहर
जारी है इसका कहर

थमने लगी है धड़कने
दिल लगा है फड़कने
अब बिना वस्त्र ताप
लग सकता है श्राप
नाक के बहने का
बंद कमरे में रहने का

ऐसे ठिठुरते हाला में
सवेरे -सवेरे यज्ञशाला में
मिल सकता है आशीष
पर होनी चाहिए कोशिश

वह बिस्तरों को छोड़कर
आलस्य से मुंह मोड़कर
पहली ये सफलता पानी है
फिर तो जोर जवानी है।

                   - राजू राम

Monday, 18 December 2017

आओ मिलकर समाज को दिलाए बाल विवाह की कुरीति के कंलक से मुक्ति



यदि समाज के रिती-रिवाजों के चलते किसी को अपनी जिदंगी से हाथ धोना पड़ता है, किसी को जीवनभर जीवनसाथी के साथ मतभेद-मनभेद रखना पड़ता है, किसी को उम्र भर तानाशाही का दंश झेलना पड़ता है, किसी को जीवन लक्ष्य बदलना पड़ता है, किसी को इच्छित संगिनी का त्याग करना पड़ता है, किसी को छिप-छिपकर प्यार करना पड़ता है, किसी को वैश्या बनकर जिंदगी जीनी पड़ती है, किसी को अपने शरीर को बीमारियों का घर बनाना पड़ता है और किसी को पूरी जिदंगी कुण्ठा से गुजारनी पड़ती है। तो ये रीति-रिवाज हमारी आदर्श परंपरा के अंग नहीं बल्कि कुरीति है, जो समाज को कमजोर बनाने का कार्य करते है।
bal vivah के लिए इमेज परिणाम

आप समझ गए होंगे मैं यहाँ कौन-सी रीति-नीति की बात कर रहा हूँ। शायद आप में से अधिकतर युवा (राजस्थानी) उस तथाकथित परपंरा का शिकार हुए होंगे और मैं भी। वह है- बाल विवाह।
हमारे बचपन में ही पचपन से बड़ी उम्र वाले रिश्तेदार यह तय कर देते है कि हमें हमारा जीवन किस के साथ बिताना है। जब हमारे दूध के दांत गिरकर पक्के दांत आते हैं तो जिनके पक्के दांत गिरने की कगार पर होते है, वे बताते हैं  कि ’’बेटा फलां घर की छोकरी या छोकरे के साथ तेरो ब्याह होग्यो है, अब 2-4 साल ठहर तेरा गोना भी हो जाएगा।’’ बच्चा कोई प्रश्न करे उससे पहले ही माता-पिता उसे बता देते है ’’तेरे दादा-दादी ने हमारी शादी भी छोटी उम्र में करा दी थी। अतः कम उम्र में शादी अपने यहां पूर्वजों की परपंरा है।’’
फिर वह बच्चा भी खुश होता है कि मैं भी 4 साल बाद बिनणी वाला हो जाऊंगा। कुछ समय के बाद शादी हो जाती है और बच्चा बीनणीधारी बन जाता है। शुरूआत में नयी-नवेली शादी का जोश होता है, एक-दूसरे से बड़ा प्यार करते हैं। मगर धीरे-धीरे वैचारिक मतभेद-मनभेद बढ़ते है। और उनके जीवन की पुरानी परते खुलती है और मतभेद संग्राम का रूप ले लेते है। अब यह संग्राम जीवनभर चलता है। नयी पीढ़ी इसी संग्राम में संस्कार लेती है, जिसका परिणाम बच्चों का भटकन के रूप में दिखता है।
यह तो हुई उन बेटे-बेटियों की बात जिन्होंने अपने पूर्वजों की परपंरा को बिना किसी परवाह किये आगे बढ़ाया।

इसके अलावा एक दूसरा वर्ग और भी है वह है शिक्षित युवा पीढ़ी का। जो अपने को जागरूक समझता है। उन्हें यह मालूम है कि समाज में प्रचलित बाल-विवाह गलत है, इसके भंयकर दुष्परिणाम है। फिर भी वे उसे सहते हैं। हाँ, कुछ युवा साथी इसका विरोध भी करते हैं, उन्हें परिवार व समाज के साथ संघर्ष करना पड़ता है। और वह संघर्ष उस मोड़ तक पहुँच जाता है जहाँ वह अपनी जीवन लीला समाप्त कर देता है।
यह है राजस्थान के अधिकतर युवाओं की कहानी।


जिम्मेदारी युवा पीढ़ी के कंधो पर
अब देश बदलाव के दौर से गुजर रहा है। चाहे वह आर्थिक हो या फिर राजनैतिक। ऐसे समय में सामाजिक परिवर्तन की भी आवश्यकता है। और यह परिवर्तन आज की युवा पीढ़ी ही कर सकती है। जिसका शुभांरभ बाल विवाह जैसी कुप्रथा के कलंक से समाज को मुक्ति दिलाकर करनी होगी। परिवर्तन की शुरूआत अपने परिवार से करनी होगी, फिर पड़ोस व उतरोत्तर समूचे समाज में क्रांति की लहर पैदा करनी होगी। कहा जाता है जवानी जिस ओर डोलती है जमाना भी उसी तरफ होता है। उम्मीद है अब यह जवानी जरूर बाल-विवाह के विरूद्ध सामाजिक क्रांति का बिगुल फूंकेगी। और देखते ही देखते जमाने से इस कुरीति का नामोनिशान मिट जाएगा। इस बात की प्रबल संभावना है कि कुछ रूढ़िवादी सोच के लोग आपसे नाराज होंगे। पर आपको उनकी नाराजगी को दूर करने के लिए अपने लक्ष्य से नहीं भटकना है वरन आप उनके लिए अन्य सुख-सुविधाओं के संसाधन मुहैया कराए। फिर भी न माने तो कठोर रास्ता अख्तियार करने से न घबराए।

Thursday, 16 November 2017

यथा दृष्टि तथा सृष्टि


एक मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था। निर्माण में लगे तीन मजदूरों को काम करता देख निकट रास्ते से गुजर रहे एक बुद्धिमान शख्स ने उनसे पूछा कि भाई साहब जी क्या कर रहे हो ? जवाब में पहले मजदूर ने कहा अरे क्या बताऊँ, सुबह से इन पत्थरों से माथापच्ची कर रहा हूँ। दूसरे ने कहा कि मेहनत करके कुछ धन अर्जित कर रहा हूँ ताकि मैं अपना व परिवार का गुजारा चला संकू। तीसरे ने बताया मैं भगवान का घर बना रहा हूँ। जिसमें लोग बड़ी श्रद्धा से आकर मथा टेकेंगे।
इस कहानी में जीवन का गहरा मर्म छिपा है। यदि इसे समझ लिया जाए तो जीवन का अर्थ समझ में आ जाता है। साथ ही जीवन जीने की कला में भी निपुण बना जा सकता है।
कहानी में तीनों मजदूर कार्य एक ही कर रहे थे। मगर फिर भी उसमें बहुत बड़ी भिन्नता थी। वह भिन्नता थी- उनके भावों की, उनके नजरिये की, उनके कार्य के प्रति दृष्टिकोण की। इस दुनिया में हर कोई कुछ न कुछ करता रहता है। उनके कार्य भी एक जैसे होते है। पर हर किसी का दृष्टिकोण अपना होता है। जो उन्हें अन्य लोगों से अलग बनाता है।
यदि आप अपने चारों तरफ नजर दौड़ाते है तो सामान्यतः दो प्रकार के लोग देखने को मिलेंगे। एक सकारात्मक सोच वाले व दूसरे नकारात्मक सोच वाले।
सकारात्मक सोच वाले लोगों में एक प्रमुख और आम विशेषता होती है कि उनका दुनिया को देखने का नजरिया सकारात्मक होता है, वे लोग गुणग्राही प्रकृति के होते है। वे किसी भी घटना या वस्तु के सकारात्मक पक्ष को देखकर प्रसन्न रहते हैं। यदि उसमें कुछ नकारात्मक पक्ष हैं तो उसमें सुधारकर आगे बढ़ने में वे विश्वास रखते  हैं।  जितने भी महापुरूष हुए हैं। उनके जीवन पर नजर डाली जाए तो यही बात निकलकर सामने आती है कि उनका दुनिया के प्रति नजरिया निराला था।
दूसरे लोग होते हैं नकारात्मक सोच वाले। उनका दृष्टिकोण नकारात्मक होता है। वे संसार की आदर्श से आदर्श वस्तु में भी कमी निकालने की जुगत में रहते हैं। यहां तक कि ईश्वर जिसे दोषरहित माना जाता है, उसमें भी कमी निकाल सकते हैं। ऐसे लोग किसी भी तरीके से नकारात्मक भाव को गृहण कर उसी में समय की बर्बादी करते है। उनकी एक आम विशेषता होती है- उनका निराशापूर्ण जीवन। उनमें  जीवन के किसी भी कोने में आशा नहीं रहती है। उनके जीवन के पहिये प्रगति की बजाय दूर्गति की और बढ़ते हैं।
यदि आप ऐसा सुने कि कोई  विशेष व्यक्ति सुसभ्य, सुसंस्कृत व अन्य लोगों के लिए आदर्श है। तो आप समझ लेना उस व्यक्ति का दृष्टिकोण आदर्श है। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, भगतसिंह व एपीजे अब्दुल कलाम जैसे महापुरूषों का नाम सुना ही होगा। वे महापुरूष इसलिए कहलाए क्योंकि उनका दुनिया को देखने का नजरिया भिन्न था।
तो अब देखिए आपका दुनिया को लेकर क्या नजरिया है ? अपने जीवन के प्रति क्या दृष्टिकोण है ? उम्मीद है सकारात्मक होगा। लेकिन परख जरूर लीजिए। यदि लगे कहीं नकारात्मक का विष आपके नजरिए में घुला है। तो सजग हो जाइए क्योंकि इसी वजह से आप अपने साथियों से पिछड़ रहे हो। आप इस बात को पहले ही समझ चुके है कि ’यथा दृष्टि तथा सृष्टि’। इसलिए अपने नजरिए में सकारात्मकता की सुगंध का प्रसार कर जीवन का रास्ता सुगम बनाइए। और सुखमय जीवन जीने का आनन्द उठाईए।