Sunday, 11 February 2018

यदि ऐसा हो जाए तो बदल सकती है भारत की तस्वीर

वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने  नागपुर में एक धार्मिक संगठन की विशाल सभा को सम्बोधित किया। इस सभा में उन्होंने एक प्रस्ताव रखा। वैसे तो राजनेता अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने के लिए धार्मिक संगठनों के पास जाते है मगर इस बार राजनैतिक स्वार्थ से हटकर गडकरी ने एक नई पहल की। वह पहल गंगा ग्राम तीर्थ बनाने में विश्वसनीय धार्मिक संगठनों से  सहयोग मांगने की थी। इसका सकारात्मक जवाब भी उन्हें मिला।
इससे मेरे मन में विचार आया कि यदि राजतंत्र यानी सरकार व धर्मतंत्र मिलकर कार्य करे तो देश का विकास और अधिक रफ्तार से हो सकता है। क्योंकि राजतंत्र के पास आर्थिक शक्ति होती है, वहीं धर्मतंत्र के पास नैतिक सामर्थ्य होता है। सरकार की प्रशासनिक पकड़ मजबूत होती है वहीं धार्मिक संगठनों की जनपकड़ अच्छी होती है, समाज की अंतिम पक्ति का तबका सरकार की नहीं बल्कि धर्म गुरुओं की शरण में जाना पंसद करता है। इसलिये दोनों तंत्रों का मिलकर काम करना जरूरी है।


दुर्भाग्य से आज के हालात बहुत दयनीय है। क्योंकि  एक तरफ राजनेताओं में नैतिकता का पतन हो रहा है, जिसका दुष्प्रभाव भ्र्ष्टाचार, साम्प्रदायिक तनाव व बेतुकी बयानबाजी के रूप में देखा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर धर्मतंत्र से आसाराम, राम रहीम व रामपाल जैसे पाखण्डी लोग पकड़े जा रहे है, जिसका परिणाम लोगों की धर्म के प्रति घटती आस्था के रूप में देखा जा सकता है। 
हाल ही में राम रहीम की काली करतूतों पर हरियाणा सरकार ने पर्दा डालने का पुरजोर प्रयास किया पर कोर्ट की सख्ती के चलते सरकार के मंसूबे पूरे नहीं हुए। यहां राजतंत्र का दायित्व बाबा को उनके पाखण्ड की सजा दिलाने का था न की अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का। दूसरी तरफ कई धर्म गुरु भी स्वार्थ में आकर उन नेताओं का समर्थन कर बैठते है, जो देश के लिए घातक सिद्ध होते है। यह नेता भड़काऊ बयानबाजी कर समाज को  बांटते है। 
भारत का इतिहास इस बात गवाह है कि एक सफल राजतंत्र के पीछे हमेशा धर्म तंत्र  का हाथ रहा है चाहे वह कृष्ण के साथ उनके गुरु उपमन्यु  का हो या राम के साथ महर्षि वशिष्ठ का हो या फिर चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ चाणक्य का हो। अब बदली परिस्तिथियों में भले ही पूरानी तरह आपसी समन्वय न हो पर राष्ट्रहित के लिए दोनों तंत्र एक-दूसरे का सहयोग कर सकते है।
आज राजनीति को नैतिकता की जरूरत है, जिसकी पूर्ति धर्म से हो सकती है। वहीं धर्म को  को मोक्ष की राह देखने वाले लोगों की तलाश है। और यह तलाश ईमानदार राजनेता पूरी कर सकते है। क्योंकि अधिकतर लोगों को दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती है, यदि वो आसानी से मिल जाए तो वे मोक्ष के बारे में सोचे। जिनकी सहायता ईमानदार  राजसेवक कर सकते है। 
अतः दोनों मिलकर कार्य करे तो भारत की तमाम समस्याओं का समाधान हो सकता है। और भारत पुनः जगतगुरु बन सकता है।
इन सब के बीच एक बात ध्यान रहे है कि मैंने उन धार्मिक संगठनों की बात की है जो मानवता के धर्म को प्राथमिकता देते है, जो विविधता में एकता की संस्कृति का संरक्षण करते है, जो मंदिर-मस्जिद पर झगड़ने की बजाय लोगों के दिलों को मंदिर बनाने का कार्य करते हो, जिनका लक्ष्य राष्ट्र के नवनिर्माण का हो। और ऐसे संगठनों की पहचान किसी से छीपी नहीं है उदाहरण के तौर पर गायत्री परिवार को देखा जा सकता है, जो सप्त आंदोलन के जरिये निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा कर रहा है।

Thursday, 4 January 2018

जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है


जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है

जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है
जिसके तप से दुनिया बदली जानी है
इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य की हुंकार है
चारों दिशाओं में इसकी जय-जयकार है
जो इस ज्वाला के छाए में आया है
अपने में परिवर्तन पाया है
भावों को ऊपर उठाया है
व्यक्तित्व को महान बनाया है
यह प्रारम्भिक पोषित जिंदगानी है
जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है
जिसके तप से दुनिया बदली जानी है

विवेकानंद के विचारों पर
पूज्य गुरुदेव के पदचिन्हों पर
सब मिलकर आगे बढ़ते है
जीवन को आदर्शों से गढ़ते है
बदलते दौर की यह जवानी है
युग परिवर्तन की कहानी है
जलती मसाल विचार क्रांति की निशानी है
जिसके तप से दुनिया बदली जानी है ।
                               -"राजू राम"

आह ! क्या प्रसन्नता का पल था वह

 प्रसन्नता का पल

आह ! क्या प्रसन्नता का पल था वह। मन में खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। चेहरे पर मुस्कान स्वतः ही आ रही थी। जीवन का अद्भुत अहसास था। उस पल की छाप अभी भी वैसी ही है। वह पल था एक ऐसे साथी की मदद करने के बाद का, जिसका दाहिना हाथ किसी हादसे के कारण काम नहीं कर रहा था और ऊपर से उसके परीक्षा आ गई। संयोग से मुझे उसकी परीक्षा में लिखने का सौभाग्य मिला। मैं भी खुदा की कृपा से परीक्षा में लिखने में उसकी उम्मीद के अनुरूप कामयाब हो सका। जिसके बाद उसे बहुत खुशी मिली। उसकी खुशी से मुझे उस आनंद का अहसास हुआ मानों कि उसकी खुशी में मेरी प्रसन्न्ता छिपी थी। शायद इसी वजह से कहा जाता है कि सच्चे दिल से दूसरों की सहायता से जो सुख मिलता है वह कहीं और नहीं।
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बन गई जिसकी अमिट छाया


सर्दी से सहमे दिल से निकली ये पंक्तियां-

दिल लगा है फड़कने


हरिद्वार के है ऐसे हाल
बन गया हूँ गुदड़ी लाल
चल पड़ी है शीतलहर
हो भलें रात या दोपहर
जारी है इसका कहर

थमने लगी है धड़कने
दिल लगा है फड़कने
अब बिना वस्त्र ताप
लग सकता है श्राप
नाक के बहने का
बंद कमरे में रहने का

ऐसे ठिठुरते हाला में
सवेरे -सवेरे यज्ञशाला में
मिल सकता है आशीष
पर होनी चाहिए कोशिश

वह बिस्तरों को छोड़कर
आलस्य से मुंह मोड़कर
पहली ये सफलता पानी है
फिर तो जोर जवानी है।

                   - राजू राम

Monday, 18 December 2017

आओ मिलकर समाज को दिलाए बाल विवाह की कुरीति के कंलक से मुक्ति



यदि समाज के रिती-रिवाजों के चलते किसी को अपनी जिदंगी से हाथ धोना पड़ता है, किसी को जीवनभर जीवनसाथी के साथ मतभेद-मनभेद रखना पड़ता है, किसी को उम्र भर तानाशाही का दंश झेलना पड़ता है, किसी को जीवन लक्ष्य बदलना पड़ता है, किसी को इच्छित संगिनी का त्याग करना पड़ता है, किसी को छिप-छिपकर प्यार करना पड़ता है, किसी को वैश्या बनकर जिंदगी जीनी पड़ती है, किसी को अपने शरीर को बीमारियों का घर बनाना पड़ता है और किसी को पूरी जिदंगी कुण्ठा से गुजारनी पड़ती है। तो ये रीति-रिवाज हमारी आदर्श परंपरा के अंग नहीं बल्कि कुरीति है, जो समाज को कमजोर बनाने का कार्य करते है।
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आप समझ गए होंगे मैं यहाँ कौन-सी रीति-नीति की बात कर रहा हूँ। शायद आप में से अधिकतर युवा (राजस्थानी) उस तथाकथित परपंरा का शिकार हुए होंगे और मैं भी। वह है- बाल विवाह।
हमारे बचपन में ही पचपन से बड़ी उम्र वाले रिश्तेदार यह तय कर देते है कि हमें हमारा जीवन किस के साथ बिताना है। जब हमारे दूध के दांत गिरकर पक्के दांत आते हैं तो जिनके पक्के दांत गिरने की कगार पर होते है, वे बताते हैं  कि ’’बेटा फलां घर की छोकरी या छोकरे के साथ तेरो ब्याह होग्यो है, अब 2-4 साल ठहर तेरा गोना भी हो जाएगा।’’ बच्चा कोई प्रश्न करे उससे पहले ही माता-पिता उसे बता देते है ’’तेरे दादा-दादी ने हमारी शादी भी छोटी उम्र में करा दी थी। अतः कम उम्र में शादी अपने यहां पूर्वजों की परपंरा है।’’
फिर वह बच्चा भी खुश होता है कि मैं भी 4 साल बाद बिनणी वाला हो जाऊंगा। कुछ समय के बाद शादी हो जाती है और बच्चा बीनणीधारी बन जाता है। शुरूआत में नयी-नवेली शादी का जोश होता है, एक-दूसरे से बड़ा प्यार करते हैं। मगर धीरे-धीरे वैचारिक मतभेद-मनभेद बढ़ते है। और उनके जीवन की पुरानी परते खुलती है और मतभेद संग्राम का रूप ले लेते है। अब यह संग्राम जीवनभर चलता है। नयी पीढ़ी इसी संग्राम में संस्कार लेती है, जिसका परिणाम बच्चों का भटकन के रूप में दिखता है।
यह तो हुई उन बेटे-बेटियों की बात जिन्होंने अपने पूर्वजों की परपंरा को बिना किसी परवाह किये आगे बढ़ाया।

इसके अलावा एक दूसरा वर्ग और भी है वह है शिक्षित युवा पीढ़ी का। जो अपने को जागरूक समझता है। उन्हें यह मालूम है कि समाज में प्रचलित बाल-विवाह गलत है, इसके भंयकर दुष्परिणाम है। फिर भी वे उसे सहते हैं। हाँ, कुछ युवा साथी इसका विरोध भी करते हैं, उन्हें परिवार व समाज के साथ संघर्ष करना पड़ता है। और वह संघर्ष उस मोड़ तक पहुँच जाता है जहाँ वह अपनी जीवन लीला समाप्त कर देता है।
यह है राजस्थान के अधिकतर युवाओं की कहानी।


जिम्मेदारी युवा पीढ़ी के कंधो पर
अब देश बदलाव के दौर से गुजर रहा है। चाहे वह आर्थिक हो या फिर राजनैतिक। ऐसे समय में सामाजिक परिवर्तन की भी आवश्यकता है। और यह परिवर्तन आज की युवा पीढ़ी ही कर सकती है। जिसका शुभांरभ बाल विवाह जैसी कुप्रथा के कलंक से समाज को मुक्ति दिलाकर करनी होगी। परिवर्तन की शुरूआत अपने परिवार से करनी होगी, फिर पड़ोस व उतरोत्तर समूचे समाज में क्रांति की लहर पैदा करनी होगी। कहा जाता है जवानी जिस ओर डोलती है जमाना भी उसी तरफ होता है। उम्मीद है अब यह जवानी जरूर बाल-विवाह के विरूद्ध सामाजिक क्रांति का बिगुल फूंकेगी। और देखते ही देखते जमाने से इस कुरीति का नामोनिशान मिट जाएगा। इस बात की प्रबल संभावना है कि कुछ रूढ़िवादी सोच के लोग आपसे नाराज होंगे। पर आपको उनकी नाराजगी को दूर करने के लिए अपने लक्ष्य से नहीं भटकना है वरन आप उनके लिए अन्य सुख-सुविधाओं के संसाधन मुहैया कराए। फिर भी न माने तो कठोर रास्ता अख्तियार करने से न घबराए।

Thursday, 16 November 2017

यथा दृष्टि तथा सृष्टि


एक मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था। निर्माण में लगे तीन मजदूरों को काम करता देख निकट रास्ते से गुजर रहे एक बुद्धिमान शख्स ने उनसे पूछा कि भाई साहब जी क्या कर रहे हो ? जवाब में पहले मजदूर ने कहा अरे क्या बताऊँ, सुबह से इन पत्थरों से माथापच्ची कर रहा हूँ। दूसरे ने कहा कि मेहनत करके कुछ धन अर्जित कर रहा हूँ ताकि मैं अपना व परिवार का गुजारा चला संकू। तीसरे ने बताया मैं भगवान का घर बना रहा हूँ। जिसमें लोग बड़ी श्रद्धा से आकर मथा टेकेंगे।
इस कहानी में जीवन का गहरा मर्म छिपा है। यदि इसे समझ लिया जाए तो जीवन का अर्थ समझ में आ जाता है। साथ ही जीवन जीने की कला में भी निपुण बना जा सकता है।
कहानी में तीनों मजदूर कार्य एक ही कर रहे थे। मगर फिर भी उसमें बहुत बड़ी भिन्नता थी। वह भिन्नता थी- उनके भावों की, उनके नजरिये की, उनके कार्य के प्रति दृष्टिकोण की। इस दुनिया में हर कोई कुछ न कुछ करता रहता है। उनके कार्य भी एक जैसे होते है। पर हर किसी का दृष्टिकोण अपना होता है। जो उन्हें अन्य लोगों से अलग बनाता है।
यदि आप अपने चारों तरफ नजर दौड़ाते है तो सामान्यतः दो प्रकार के लोग देखने को मिलेंगे। एक सकारात्मक सोच वाले व दूसरे नकारात्मक सोच वाले।
सकारात्मक सोच वाले लोगों में एक प्रमुख और आम विशेषता होती है कि उनका दुनिया को देखने का नजरिया सकारात्मक होता है, वे लोग गुणग्राही प्रकृति के होते है। वे किसी भी घटना या वस्तु के सकारात्मक पक्ष को देखकर प्रसन्न रहते हैं। यदि उसमें कुछ नकारात्मक पक्ष हैं तो उसमें सुधारकर आगे बढ़ने में वे विश्वास रखते  हैं।  जितने भी महापुरूष हुए हैं। उनके जीवन पर नजर डाली जाए तो यही बात निकलकर सामने आती है कि उनका दुनिया के प्रति नजरिया निराला था।
दूसरे लोग होते हैं नकारात्मक सोच वाले। उनका दृष्टिकोण नकारात्मक होता है। वे संसार की आदर्श से आदर्श वस्तु में भी कमी निकालने की जुगत में रहते हैं। यहां तक कि ईश्वर जिसे दोषरहित माना जाता है, उसमें भी कमी निकाल सकते हैं। ऐसे लोग किसी भी तरीके से नकारात्मक भाव को गृहण कर उसी में समय की बर्बादी करते है। उनकी एक आम विशेषता होती है- उनका निराशापूर्ण जीवन। उनमें  जीवन के किसी भी कोने में आशा नहीं रहती है। उनके जीवन के पहिये प्रगति की बजाय दूर्गति की और बढ़ते हैं।
यदि आप ऐसा सुने कि कोई  विशेष व्यक्ति सुसभ्य, सुसंस्कृत व अन्य लोगों के लिए आदर्श है। तो आप समझ लेना उस व्यक्ति का दृष्टिकोण आदर्श है। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, भगतसिंह व एपीजे अब्दुल कलाम जैसे महापुरूषों का नाम सुना ही होगा। वे महापुरूष इसलिए कहलाए क्योंकि उनका दुनिया को देखने का नजरिया भिन्न था।
तो अब देखिए आपका दुनिया को लेकर क्या नजरिया है ? अपने जीवन के प्रति क्या दृष्टिकोण है ? उम्मीद है सकारात्मक होगा। लेकिन परख जरूर लीजिए। यदि लगे कहीं नकारात्मक का विष आपके नजरिए में घुला है। तो सजग हो जाइए क्योंकि इसी वजह से आप अपने साथियों से पिछड़ रहे हो। आप इस बात को पहले ही समझ चुके है कि ’यथा दृष्टि तथा सृष्टि’। इसलिए अपने नजरिए में सकारात्मकता की सुगंध का प्रसार कर जीवन का रास्ता सुगम बनाइए। और सुखमय जीवन जीने का आनन्द उठाईए।